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Preamble of Indian Constitution in Hindi: संविधान की प्रस्तावना (Preamble): दार्शनिक मूल्य, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और मूल ढांचा

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लेखक Ratan Kumawat · संस्थापक, NotesMedia

प्रकाशित:

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: भारतीय संविधान और राजव्यवस्था (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: Preamble of Indian Constitution in Hindi: संविधान की प्रस्तावना (Preamble): दार्शनिक मूल्य, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और मूल ढांचा - संविधान: विशेषताएं, मूल अधिकार और कर्तव्य
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Quick Answer: Preamble of Indian Constitution in Hindi: संविधान की प्रस्तावना (Preamble to the Constitution) भारतीय संविधान का दार्शनिक परिचय और उसका हृदय है, जो संविधान के प्राधिकार का स्रोत, राज्य का स्वरूप और राष्ट्रीय लक्ष्यों को व्यक्त करती है। पंडित जवाहरलाल नेहरू के 13 दिसंबर 1946 को पेश किए उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित इस उद्देशिका में भारत को संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। 42वें संविधान संशोधन 1976 से इसमें समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए। केशवानंद भारती वाद 1973 में इसे संविधान का अभिन्न अंग और मूल ढांचे का भाग माना गया।

प्रस्तावना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मूल पाठ (Text of Preamble)

भारतीय संविधान की प्रस्तावना को संविधान का पहचान पत्र (Identity Card of the Constitution) और दार्शनिक कुंजी कहा जाता है। यह उन नैतिक और राजनीतिक मूल्यों का सार है जिनके लिए भारत का स्वतंत्रता आंदोलन और जन जागृति का संघर्ष लड़ा गया था।

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उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) का इतिहास

13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया। इसमें उन दार्शनिक आदर्शों की रूपरेखा थी जिन पर भारत का संविधान बनना था। संविधान सभा ने 22 जनवरी 1947 को इसे सर्वसम्मति से पारित किया। इसी प्रस्ताव के बदले हुए रूप को प्रस्तावना बनाया गया, और संविधान सभा ने प्रस्तावना को सबसे अंत में (अक्टूबर 1949 में) पारित किया, ताकि यह बाकी संविधान से मेल खाए।

प्रस्तावना का मूल पाठ (Text of Preamble)

नीचे प्रस्तावना का पाठ उसी शब्द-क्रम में दिया है (भाषा थोड़ी आसान की गई है; मूल हिंदी पाठ में कुछ शब्द थोड़े अलग हैं, जैसे 'राजनैतिक', और तिथि के साथ विक्रम संवत 'मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् 2006' भी लिखा है):

"हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, और उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ईस्वी को इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

प्रस्तावना के चार मूल तत्व (Four Core Ingredients)

  • सत्ता का स्रोत: आरंभिक शब्द "हम भारत के लोग" दर्शाते हैं कि सर्वोच्च शक्ति भारत की जनता में है।
  • राज्य का स्वरूप: भारत संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।
  • शासन के लक्ष्य: नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता उपलब्ध कराना मुख्य ध्येय है।
  • स्वीकृति की तिथि: प्रस्तावना में 26 नवंबर 1949 की तिथि दर्ज है; 2015 से यह दिन संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है।

राज्य का स्वरूप: प्रमुख दार्शनिक मूल्य (Nature of the Indian State)

प्रस्तावना में भारत के राज्य-व्यवस्था के स्वरूप को तय करने वाले पांच शब्द निश्चित क्रम में हैं: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य (Sovereign, Socialist, Secular, Democratic, Republic)।

1. संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न (Sovereign)

भारत आंतरिक और बाहरी मामलों में पूरी तरह स्वतंत्र है। भारत किसी विदेशी सत्ता का डोमिनियन नहीं है। भारत अपनी सीमा में कोई भी विधि बना सकता है और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है। 1949 में राष्ट्रमंडल की स्वैच्छिक सदस्यता से संप्रभुता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

2. समाजवादी (Socialist)

42वें संशोधन 1976 से जुड़ा यह शब्द लोकतांत्रिक समाजवाद (Democratic Socialism) को व्यक्त करता है, जो मिश्रित अर्थव्यवस्था में भरोसा रखता है। डी. एस. नकारा वाद (1982) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाजवाद मार्क्सवाद और गांधीवाद का मेल है, जो गांधीवादी समाजवाद की ओर अधिक झुका है। इसका लक्ष्य निर्धनता, बीमारी और अवसरों की असमानता मिटाना है।

3. पंथनिरपेक्ष (Secular)

42वें संशोधन 1976 से जुड़ा यह शब्द 'सर्वधर्म समभाव' यानी सकारात्मक पंथनिरपेक्षता (Positive Secularism) को दर्शाता है। राज्य का कोई राजधर्म नहीं है और सभी धर्मों को समान सम्मान व सुरक्षा (अनुच्छेद 25-28) मिलती है। एस. आर. बोम्मई वाद (1994) में इसे संविधान की मूल संरचना माना गया।

2024 का फैसला: 25 नवंबर 2024 को डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ वाद में सुप्रीम कोर्ट (CJI संजीव खन्ना की बेंच) ने 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्द हटाने की याचिकाएं खारिज कर दीं और कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना पर भी लागू है।

4. लोकतंत्रात्मक (Democratic)

प्रस्तावना में लोकतंत्र राजनीतिक के साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र भी है। भारत में प्रतिनिधि संसदीय लोकतंत्र है, जिसमें वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326), आवधिक चुनाव और विधि का शासन शामिल है। स्थानीय निकायों के आवधिक चुनाव कराने वाली संस्था के बारे में राज्य निर्वाचन आयोग में पढ़ें।

5. गणराज्य (Republic)

गणराज्य का अर्थ है कि राज्य प्रमुख (राष्ट्रपति) वंशानुगत न होकर तय अवधि (5 वर्ष) के लिए जनता के चुने प्रतिनिधियों से अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है। सभी सरकारी पद प्रत्येक नागरिक के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।

संविधान के उद्देश्य: न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता

प्रस्तावना नागरिकों के कल्याण के लिए चार प्रमुख उद्देश्य तय करती है:

न्याय (Justice): 3 प्रकार

प्रस्तावना में तीन प्रकार के न्याय हैं, जो 1917 की रूसी क्रांति से प्रेरित हैं:

  • सामाजिक न्याय: जाति, धर्म, लिंग पर भेदभाव समाप्त करना और कमजोर वर्गों का उत्थान।
  • आर्थिक न्याय: धन और संपदा के असमान संकेंद्रण को रोकना। सामाजिक और आर्थिक न्याय मिलकर वितरणात्मक न्याय बनाते हैं।
  • राजनीतिक न्याय: सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार, मताधिकार और चुनाव में भागीदारी देना।

स्वतंत्रता (Liberty): 5 प्रकार

प्रस्तावना नागरिकों को पांच तरह की स्वतंत्रता देती है: विचार (Thought), अभिव्यक्ति (Expression), विश्वास (Belief), धर्म (Faith) और उपासना (Worship)। यह स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेदों (जैसे अनुच्छेद 19(2)) की मर्यादाओं में बंधी है। यह विचार 1789 की फ्रांसीसी क्रांति से लिया गया है।

समता (Equality): 2 प्रकार

समता का अर्थ विशेष अधिकारों का अभाव और समान अवसर मिलना है। प्रस्तावना दो प्रकार की समता सुनिश्चित करती है: प्रतिष्ठा की समता और अवसर की समता। मूल अधिकारों में समता का अधिकार अनुच्छेद 14-18 में है; सरकारी नौकरी में अवसर की समता खास तौर पर अनुच्छेद 16 देता है।

बंधुता (Fraternity): गरिमा और अखंडता

बंधुता का अर्थ आपसी भाईचारा है, जो व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता को सुरक्षित करता है। 'अखंडता' शब्द 42वें संशोधन 1976 से शामिल किया गया।

42वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 और प्रस्तावना

संविधान लागू होने के बाद प्रस्तावना में अब तक (2026 तक) केवल एक बार संशोधन हुआ है। 42वें संविधान संशोधन 1976 (लागू 3 जनवरी 1977) से तीन नए शब्द जोड़े गए: समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता (राष्ट्र की एकता और अखंडता)।

प्रस्तावना की संवैधानिक स्थिति और न्यायिक विकास (Judicial Evolution)

प्रस्तावना संविधान का भाग है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले रहे हैं:

1. बेरुबारी संघ वाद (1960)

8 जजों की पीठ ने कहा कि प्रस्तावना निर्माताओं के विचारों की कुंजी तो है, पर यह संविधान का हिस्सा नहीं है। (प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है या नहीं, यह सवाल बाद में केशवानंद भारती वाद में तय हुआ।)

2. केशवानंद भारती वाद (1973)

13 जजों की सबसे बड़ी पीठ ने बेरुबारी फैसले को पलटते हुए निर्णय दिया:

  • प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग (Integral Part) है।
  • संविधान सभा ने इसे भी अन्य अनुच्छेदों की तरह पारित किया था।
  • अनुच्छेद 368 से इसमें संशोधन हो सकता है, बशर्ते संविधान की मूल संरचना नष्ट न हो।

3. एस. आर. बोम्मई वाद (1994) और एलआईसी वाद (1995)

बोम्मई वाद (1994) में पंथनिरपेक्षता को मूल संरचना का भाग माना गया। एलआईसी ऑफ इंडिया वाद (1995) में फिर से तय हुआ कि प्रस्तावना संविधान का आंतरिक भाग है।

प्रस्तावना की कानूनी प्रकृति (Legal Status)

  • गैर-न्यायिक (Non-justiciable): प्रस्तावना न्यायालय में सीधे लागू नहीं कराई जा सकती।
  • विधायिका की शक्ति: यह विधायिका की शक्ति का स्रोत नहीं है और न ही उसकी शक्ति पर रोक लगाती है। अस्पष्ट अनुच्छेदों की व्याख्या में न्यायालय प्रस्तावना का सहारा लेता है।

प्रस्तावना के प्रमुख आदर्श और तुलनात्मक सारणी

प्रस्तावना के मुख्य तत्वों, स्रोतों और संवैधानिक स्थिति का तुलनात्मक विवरण नीचे दी गई सारणी में दिया गया है:

दार्शनिक तत्व स्रोत / पृष्ठभूमि संबद्ध अनुच्छेद परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु
संप्रभुता स्वाधीनता आंदोलन उद्देशिका आंतरिक और बाह्य दबाव से मुक्त शासन
समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद अनुच्छेद 39(b), 39(c) 42वें संशोधन से शामिल, मिश्रित मॉडल
पंथनिरपेक्षता सर्वधर्म समभाव अनुच्छेद 25 से 28 राज्य का कोई धर्म नहीं, सभी को संरक्षण
लोकतंत्र संसदीय व्यवस्था अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार और जनता का शासन
गणराज्य फ्रांस का संविधान अनुच्छेद 54, 55 निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष, वंशानुगत नहीं
सामाजिक-आर्थिक न्याय 1917 रूसी क्रांति अनुच्छेद 38, 39 कमजोर वर्गों का कल्याण और समानता
स्वतंत्रता, समता, बंधुता 1789 फ्रांसीसी क्रांति अनुच्छेद 14-22, 51A मानवीय गरिमा और राष्ट्र की अखंडता

प्रस्तावना से जुड़े प्रमुख न्यायिक मामलों के ऐतिहासिक निर्णयों की तुलना नीचे दी गई है:

वाद का नाम वर्ष पीठ संख्या सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
बेरुबारी संघ वाद 1960 8 जज प्रस्तावना संविधान का अंग नहीं
केशवानंद भारती वाद 1973 13 जज प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग, मूल संरचना सुरक्षित रखकर संशोधनीय
एस. आर. बोम्मई वाद 1994 9 जज पंथनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना का अनिवार्य अंग
एलआईसी ऑफ इंडिया वाद 1995 - प्रस्तावना संविधान का आंतरिक भाग है, फिर से पुष्टि
डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ 2024 2 जज 'समाजवादी' व 'पंथनिरपेक्ष' जोड़ना वैध, याचिकाएं खारिज

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision)

  • प्रस्तावना की आधारशिला पंडित नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव है, जो 13 दिसंबर 1946 को पेश और 22 जनवरी 1947 को पास हुआ।
  • प्रस्तावना से संविधान शुरू करने की परंपरा अमेरिकी संविधान से आई, जो प्रस्तावना वाला पहला संविधान था।
  • प्रस्तावना के आरंभिक शब्द "हम भारत के लोग" जनता की सर्वोच्च शक्ति व्यक्त करते हैं।
  • प्रस्तावना में 26 नवंबर 1949 की तारीख दर्ज है, जिसे 2015 से संविधान दिवस के रूप में मनाते हैं।
  • 42वें संशोधन 1976 से केवल एक बार संशोधन हुआ, जिसमें तीन शब्द (समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता) जुड़े।
  • प्रस्तावना में 3 प्रकार के न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक) का क्रमबद्ध वर्णन है।
  • प्रस्तावना में 5 प्रकार की स्वतंत्रता (विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म, उपासना) का उल्लेख है।
  • प्रस्तावना में 2 प्रकार की समता (प्रतिष्ठा और अवसर) की बात कही गई है।
  • प्रस्तावना गैर-न्यायिक (Non-justiciable) है, यानी यह कोर्ट में सीधे लागू नहीं होती।
  • के. एम. मुंशी ने प्रस्तावना को संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य की राजनीतिक जन्मपत्री कहा था।
  • पंडित ठाकुरदास भार्गव ने प्रस्तावना को संविधान का सबसे कीमती हिस्सा और आभूषण बताया था।
  • केशवानंद भारती वाद 1973 में माना गया कि अनुच्छेद 368 से प्रस्तावना में संशोधन संभव है।
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RAS Prelims MCQ

  1. संविधान की प्रस्तावना में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' शब्द किस संशोधन से जुड़े?
    A) 44वां संशोधन 1978
    B) 42वां संशोधन 1976
    C) 52वां संशोधन 1985
    D) 86वां संशोधन 2002
    उत्तर: B) 42वां संशोधन 1976
    कारण: 42वें संविधान संशोधन 1976 से ये तीन नए शब्द जोड़े गए।
  2. प्रस्तावना में दिए गए शब्दों का सही क्रम कौन सा है?
    A) संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य
    B) संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, लोकतंत्रात्मक, पंथनिरपेक्ष, समाजवादी, गणराज्य
    C) संप्रभु, पंथनिरपेक्ष, समाजवादी, गणराज्य, लोकतंत्रात्मक
    D) लोकतंत्रात्मक, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, संप्रभु, गणराज्य
    उत्तर: A) संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य
    कारण: संविधान के मूल पाठ में यही क्रम दर्ज है।
  3. सुप्रीम कोर्ट ने किस वाद में प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना?
    A) बेरुबारी संघ वाद (1960)
    B) गोलकनाथ वाद (1967)
    C) केशवानंद भारती वाद (1973)
    D) मिनर्वा मिल्स वाद (1980)
    उत्तर: C) केशवानंद भारती वाद (1973)
    कारण: 13 जजों की पीठ ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग स्वीकार किया।
  4. प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता और समता का सही संख्या क्रम क्या है?
    A) 3 न्याय, 5 स्वतंत्रता, 2 समता
    B) 5 न्याय, 3 स्वतंत्रता, 2 समता
    C) 2 न्याय, 4 स्वतंत्रता, 3 समता
    D) 3 न्याय, 4 स्वतंत्रता, 2 समता
    उत्तर: A) 3 न्याय, 5 स्वतंत्रता, 2 समता
    कारण: 3 न्याय, 5 स्वतंत्रता और 2 समता का उल्लेख है।
  5. स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श किस क्रांति से प्रेरित हैं?
    A) रूसी क्रांति (1917)
    B) अमेरिकी क्रांति (1776)
    C) फ्रांसीसी क्रांति (1789)
    D) 1857 की क्रांति
    उत्तर: C) फ्रांसीसी क्रांति (1789)
    कारण: यह तीनों आदर्श फ्रांसीसी क्रांति से लिए गए हैं।
  6. प्रस्तावना की कानूनी स्थिति के संबंध में क्या सही है?
    A) यह न्यायालय में सीधे वाद योग्य है
    B) यह गैर-न्यायिक है और शक्ति का स्वतंत्र स्रोत नहीं है
    C) यह संसद की शक्ति पर रोक लगाती है
    D) यह केवल राष्ट्रपति आदेश से लागू होती है
    उत्तर: B) यह गैर-न्यायिक है और शक्ति का स्वतंत्र स्रोत नहीं है
    कारण: प्रस्तावना अदालत में लागू कराने योग्य नहीं है और न यह विधायिका की शक्ति का स्रोत है, न उस पर रोक।
  7. प्रस्तावना को "संविधान का पहचान पत्र" किसने कहा था?
    A) डॉ. बी. आर. अंबेडकर
    B) जवाहरलाल नेहरू
    C) एन. ए. पालकीवाला
    D) के. एम. मुंशी
    उत्तर: C) एन. ए. पालकीवाला
    कारण: एन. ए. पालकीवाला ने इसे संविधान का पहचान पत्र कहा था।
  8. संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव कब पेश हुआ था?
    A) 9 दिसंबर 1946
    B) 13 दिसंबर 1946
    C) 22 जनवरी 1947
    D) 26 नवंबर 1949
    उत्तर: B) 13 दिसंबर 1946
    कारण: पंडित नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था।
  9. प्रस्तावना में 'गणराज्य' शब्द का क्या तात्पर्य है?
    A) प्रधानमंत्री देश का वास्तविक प्रमुख है
    B) राज्य प्रमुख निर्वाचित होता है, वंशानुगत नहीं
    C) देश में एक ही दल है
    D) संसद सर्वोच्च संस्था है
    उत्तर: B) राज्य प्रमुख निर्वाचित होता है, वंशानुगत नहीं
    कारण: गणराज्य में सर्वोच्च पद निर्वाचित प्रतिनिधि के पास रहता है।
  10. प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय कहां से प्रेरित हैं?
    A) 1917 की रूसी क्रांति से
    B) आयरलैंड के संविधान से
    C) कनाडा के संघ से
    D) ऑस्ट्रेलिया के संविधान से
    उत्तर: A) 1917 की रूसी क्रांति से
    कारण: न्याय के ये तीन रूप रूसी क्रांति से प्रेरित हैं।

RAS Mains Questions

Exam के लिए Important Questions नीचे दिए गए हैं:

Short Questions (2–3 marks)

  1. 'संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न' शब्द का क्या अर्थ है? (2 marks)
    उत्तर रूपरेखा: भारत आंतरिक और बाह्य रूप से पूरी तरह स्वतंत्र है। भारत किसी विदेशी सत्ता के अधीन नहीं है और अपनी नीति तय करने में पूरी तरह समर्थ है।
  2. भारतीय संविधान में पंथनिरपेक्षता का सकारात्मक भाव क्या है? (2 marks)
    उत्तर रूपरेखा: इसका अर्थ 'सर्वधर्म समभाव' है। राज्य का कोई राजधर्म नहीं है और सभी धर्मों को समान सम्मान, सुरक्षा और स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-28) प्राप्त है।
  3. बेरुबारी और केशवानंद भारती वादों में मुख्य अंतर क्या था? (3 marks)
    उत्तर रूपरेखा: बेरुबारी वाद (1960) में प्रस्तावना को संविधान का अंग नहीं माना गया। केशवानंद भारती वाद (1973) में इसे अभिन्न अंग मानकर मूल संरचना सुरक्षित रखकर संशोधनीय ठहराया गया।
  4. प्रस्तावना में 'व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता व अखंडता' का क्या महत्व है? (3 marks)
    उत्तर रूपरेखा: यह बंधुता के दो आधार हैं। गरिमा मानवीय अधिकारों की रक्षा करती है, जबकि अखंडता (42वें संशोधन से शामिल) देश की भौगोलिक एकजुटता सुनिश्चित करती है।

Long Questions (5–10 marks)

  1. "प्रस्तावना भारतीय संविधान का दार्शनिक दर्पण है।" समीक्षा कीजिए। (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - पृष्ठभूमि: उद्देश्य प्रस्ताव पर आधारित प्रस्तावना संविधान के नैतिक दर्शन का सार है।
    - सत्ता का स्रोत: "हम भारत के लोग" से स्पष्ट है कि संप्रभुता जनता में है।
    - स्वरूप: संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य का संकल्प।
    - लक्ष्य: न्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक), पांच स्वतंत्रताएं, समता और बंधुता।
    - न्यायिक दृष्टिकोण: केशवानंद भारती वाद में इसे मूल संरचना और व्याख्या का आधार माना गया।
    - सार: यह राष्ट्रीय लक्ष्यों का दार्शनिक घोषणापत्र है।
  2. क्या प्रस्तावना में अनुच्छेद 368 से संशोधन संभव है? न्यायिक निर्णयों से समझाइए। (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - बेरुबारी वाद (1960): कोर्ट ने इसे संविधान का अंग नहीं माना।
    - केशवानंद भारती वाद (1973): 13 जजों की पीठ ने इसे अभिन्न अंग माना और अनुच्छेद 368 से संशोधनीय ठहराया।
    - मूल संरचना की सीमा: संसद बुनियादी तत्वों को नष्ट करने वाला संशोधन नहीं कर सकती।
    - 42वां संशोधन 1976: समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द जोड़े गए; 2024 में बलराम सिंह वाद में सुप्रीम कोर्ट ने इसे सही ठहराया।
    - सार: प्रस्तावना संशोधनीय है, किंतु केवल मूल संरचना के दायरे में।

FAQs

क्या प्रस्तावना अदालत में लागू कराने योग्य है?

नहीं, प्रस्तावना गैर-न्यायिक (Non-justiciable) है। इसके आधार पर सरकार को कोई कार्य करने के लिए अदालत से बाध्य नहीं किया जा सकता।

प्रस्तावना में अब तक कितनी बार संशोधन हुआ है?

प्रस्तावना में केवल एक बार 42वें संशोधन 1976 से संशोधन हुआ, जिसमें समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता शब्द शामिल किए गए।

प्रस्तावना में कितने प्रकार के न्याय का उल्लेख है?

प्रस्तावना में 3 प्रकार के न्याय का संकल्प है: सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय और राजनीतिक न्याय।

प्रस्तावना को संविधान सभा में कब पेश किया गया था?

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया, जिसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार किया गया। इसी के बदले हुए रूप को बाद में प्रस्तावना बनाया गया।

परीक्षा के लिए याद रखें

  • प्रस्तावना का आधार: नेहरू का उद्देश्य प्रस्ताव (13 दिसंबर 1946 पेश, 22 जनवरी 1947 पारित)।
  • शब्द क्रम: संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य।
  • केवल एक संशोधन: 42वां (1976), तीन शब्द: समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, अखंडता।
  • 3 न्याय, 5 स्वतंत्रता, 2 समता।
  • बेरुबारी (1960): अंग नहीं; केशवानंद भारती (1973): अभिन्न अंग; LIC (1995): फिर पुष्टि।
  • 'पहचान पत्र': एन. ए. पालकीवाला; 'राजनीतिक जन्मपत्री': के. एम. मुंशी।
  • बलराम सिंह वाद (25 नवंबर 2024): समाजवादी व पंथनिरपेक्ष शब्द वैध।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Quick Answer: Preamble of Indian Constitution in Hindi: संविधान की प्रस्तावना (Preamble to the Constitution) भारतीय संविधान का दार्शनिक परिचय और उसका हृदय है, जो संविधान के प्राधिकार का स्रोत, राज्य का स्वरूप और राष्ट्रीय लक्ष्यों को व्यक्त।
भारतीय संविधान और राजव्यवस्था के पाठ्यक्रम में Preamble of Indian Constitution in Hindi: संविधान की प्रस्तावना (Preamble): दार्शनिक मूल्य, समाजवाद, पंथनिरपेक्षता और मूल ढांचा एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मुख्य सिद्धांतों, परीक्षा प्रश्नों और सूत्रों को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
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