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राजस्थान में जन जागरण एवं स्वतन्त्रता संग्राम

1857 की क्रांति

पृष्ठभूमि और कारण

  • 1818 की संधियाँ: राजपूत राज्यों ने मराठों और पिंडारियों से सुरक्षा के लिए अंग्रेजों के साथ संधियाँ कीं, जिसके परिणामस्वरूप आंतरिक प्रशासन (जोधपुर, जयपुर, कोटा, मेवाड़) में ब्रिटिश हस्तक्षेप बढ़ गया।
  • आर्थिक शोषण: राज्यों पर खिराज (Tribute) और ब्रिटिश बटालियन (मेरवाड़ा बटालियन, शेखावाटी ब्रिगेड, जोधपुर लीजियन) के रखरखाव का आर्थिक बोझ डाला गया।
  • उत्तराधिकार में हस्तक्षेप: अलवर, भरतपुर और डूंगरपुर में गोद लेने और उत्तराधिकार के मामलों में अंग्रेजों ने हस्तक्षेप किया।
  • तात्कालिक कारण: एनफील्ड राइफल्स में चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग।

क्रांति के प्रमुख केंद्र

स्थान तिथि विवरण
नसीराबाद 28 मई, 1857 राजस्थान में क्रांति का सूत्रपात। 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री ने विद्रोह किया। अंग्रेज अधिकारी स्पोटिस वुड और न्यूबरी मारे गए। सैनिक दिल्ली चले गए।
नीमच 3 जून, 1857 सैनिकों ने विद्रोह कर शस्त्रागार जला दिया। वे शाहपुरा, निम्बाहेड़ा, देवली और टोंक होते हुए दिल्ली पहुँचे।
एरिनपुरा 21 अगस्त, 1857 जोधपुर लीजियन ने विद्रोह किया। नारा: "चलो दिल्ली, मारो फिरंगी"। आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने नेतृत्व किया।
कोटा 15 अक्टूबर, 1857 जन विद्रोह। मेजर बर्टन और उसके पुत्रों की हत्या। लाला जयदयाल और मेहराब खां ने नेतृत्व किया। महारावल रामसिंह द्वितीय को नजरबंद किया गया।

आउवा (मारवाड़) का संघर्ष

  • नेतृत्व: ठाकुर कुशाल सिंह चम्पावत
  • बिथोड़ा (8 सितम्बर) और चेलावास (18 सितम्बर) के युद्धों में जोधपुर और अंग्रेजों की संयुक्त सेना को हराया।
  • जोधपुर के पोलिटिकल एजेंट मॉक मेसन का सिर काटकर किले के दरवाजे पर लटका दिया।
  • जनवरी 1858 में ब्रिगेडियर होम्स ने आउवा पर अधिकार किया। सुगाली माता की मूर्ति को अजमेर ले जाया गया।

कोटा का संघर्ष

  • नेतृत्व: लाला जयदयाल और रिसालदार मेहराब खां
  • विद्रोहियों ने लगभग 6 महीने तक प्रशासन अपने हाथ में रखा।
  • मार्च 1858 में जनरल रॉबर्ट्स ने कोटा को मुक्त कराया। जयदयाल और मेहराब खां को फांसी दी गई।

राजनीतिक जनजागरण

समाज सुधारक व प्रेस की भूमिका

  • स्वामी दयानंद सरस्वती: स्वधर्म, स्वराज्य और स्वदेशी का नारा दिया। उदयपुर में सत्यार्थ प्रकाश लिखा। 1883 में परोपकारिणी सभा की स्थापना की।
  • समाचार पत्र:
    • राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान: विजय सिंह पथिक और राजस्थान सेवा संघ द्वारा प्रकाशित।
    • त्याग भूमि: हरिभाऊ उपाध्याय द्वारा संपादित।
    • प्रताप: गणेश शंकर विद्यार्थी (कानपुर) द्वारा, जिसने बिजौलिया आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान दी।

प्रमुख क्रांतिकारी

  • अर्जुन लाल सेठी (जयपुर): क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के लिए वर्धमान पाठशाला स्थापित की। कथन: "यदि अर्जुन लाल नौकरी करेगा तो अंग्रेजों को बाहर कौन निकालेगा?"
  • केसरी सिंह बारहठ (शाहपुरा): "चेतावनी रा चूँगट्या" (13 सोरठा) लिखकर मेवाड़ महाराणा फतह सिंह को दिल्ली दरबार (1903) जाने से रोका।
  • प्रताप सिंह बारहठ: केसरी सिंह के पुत्र। बरेली जेल में यातनाओं से शहीद हुए। कथन: "मेरी माँ रोती है तो रोने दो, मैं सैकड़ों माताओं को रुलाकर अपनी माँ को हँसाना नहीं चाहता।"
  • राव गोपाल सिंह खरवा: सशस्त्र क्रांति (1915) की योजना से जुड़े थे।

जनजातीय एवं किसान आंदोलन

जनजातीय आंदोलन

  • गोविन्द गुरु: भीलों को संगठित करने के लिए सम्प सभा (1883) की स्थापना की। भगत आंदोलन चलाया। मानगढ़ धाम हत्याकांड (1913): ब्रिटिश सेना द्वारा 1500 भील मारे गए।
  • मोतीलाल तेजावत: 1921 में एकी आंदोलन चलाया। आदिवासियों के मसीहा कहे जाते हैं।

किसान आंदोलन

  • बिजौलिया आंदोलन (1897-1941): अहिंसात्मक और सबसे लम्बा चलने वाला आंदोलन। 84 प्रकार की लाग-बाग के विरुद्ध। नेतृत्व: साधु सीताराम दास, Vijay Singh Pathik, माणिक्य लाल वर्मा।
  • अन्य आंदोलन: बेंगू (रामनायण चौधरी), अलवर/भरतपुर (मेव किसान आंदोलन), शेखावाटी (जाट आंदोलन)।

प्रजामण्डल आंदोलन

उद्देश्य: रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना।

रियासत प्रमुख नेता विशेष विवरण
जयपुर जमनालाल बजाज, हीरालाल शास्त्री जेंटलमैन एग्रीमेंट (1942): शास्त्री जी और मिर्जा इस्माइल के बीच (प्रजामंडल भारत छोड़ो आंदोलन में भाग नहीं लेगा)। बाबा हरिश्चंद्र ने आजाद मोर्चा का गठन कर आंदोलन में भाग लिया।
जोधपुर (मारवाड़) जय नारायण व्यास, भंवरलाल सर्राफ बालमुकुंद बिस्सा की जेल में भूख हड़ताल से मृत्यु (1942)। महिलाओं (रमा देवी, कृष्णा कुमारी) का सक्रिय योगदान।
मेवाड़ (उदयपुर) माणिक्य लाल वर्मा, बलवंत सिंह मेहता स्थापना 1938 में। रमेश चंद्र व्यास मेवाड़ के प्रथम सत्याग्रही थे।
बीकानेर मघाराम वैद्य, रघुवर दयाल गोयल रघुवर दयाल गोयल को राज्य से निष्कासित किया गया।
कोटा पं. नयनूराम शर्मा, अभिन्न हरि 1942 में छात्रों ने रामपुरा कोतवाली पर अधिकार कर लिया था।
डूंगरपुर भोगिलाल पंड्या (वागड़ के गांधी) रास्तापाल कांड (1947): अपने शिक्षक सेंगाभाई को बचाने के प्रयास में भील बालिका काली बाई शहीद हुई।
जैसलमेर मीठा लाल व्यास सागरमल गोपा को जेल में जिंदा जला दिया गया (1946)। उन्होंने "जैसलमेर में गुंडाराज" पुस्तक लिखी थी।

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