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Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग क्या है

Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग क्या है?


  • रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग (Requirements Engineering) सॉफ़्टवेयर विकास में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं को समझा, परिभाषित, और प्रलेखित किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है 
  • कि विकसित होने वाला सॉफ़्टवेयर उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं को पूरी तरह से पूरा कर सके। यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसमें सही ढंग से जरूरतों का विश्लेषण करके एक उच्च गुणवत्ता वाले सॉफ़्टवेयर का विकास संभव होता है।
  • रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग एक अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो सॉफ़्टवेयर विकास में सही और समय पर निर्णय लेने में सहायक होती है। यह प्रक्रिया एक अच्छी तरह से परिभाषित, सटीक, और प्रभावी सॉफ़्टवेयर का आधार होती है। इसके माध्यम से सॉफ़्टवेयर न केवल उच्च गुणवत्ता का होता है, 
  • बल्कि उपयोगकर्ता की आवश्यकताओं के अनुसार भी होता है।
Introduction of Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग का परिचय :

रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग सॉफ़्टवेयर विकास प्रक्रिया की शुरुआती और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। इस चरण में सॉफ़्टवेयर को लेकर उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण, आवश्यकताओं, और अपेक्षाओं को समझा जाता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से उन सभी कार्यों और विशेषताओं को इकट्ठा किया जाता है जिन्हें सॉफ़्टवेयर में शामिल करना आवश्यक होता है।

इस प्रक्रिया के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

  • उपयोगकर्ता की अपेक्षाओं को समझना।
  • कार्यात्मक (Functional) और गैर-कार्यात्मक (Non-functional) आवश्यकताओं का विश्लेषण और परिभाषा करना।
  • आवश्यकताओं की स्थिरता और पूर्णता सुनिश्चित करना।

Stages of Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग के चरण :

रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग में मुख्यतः चार प्रमुख चरण होते हैं:

1. आवश्यकताओं का इकट्ठा करना (Requirements Elicitation)

इस चरण में उपयोगकर्ताओं, व्यवसाय प्रबंधकों और अन्य हितधारकों (stakeholders) से आवश्यकताओं को इकट्ठा किया जाता है। यह चरण महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उपयोगकर्ता की अपेक्षाएँ और आवश्यकताएँ सही तरह से समझनी होती हैं। इस चरण में कई तकनीकों का उपयोग किया जाता है, जैसे:

  • साक्षात्कार (Interviews): उपयोगकर्ताओं और हितधारकों से सीधे साक्षात्कार लेना।
  • सर्वेक्षण (Surveys and Questionnaires): विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से आवश्यकताओं को समझना।
  • वस्तु अवलोकन (Observation): उपयोगकर्ताओं के कार्य करने के तरीके को देखना।
  • वर्कशॉप (Workshops): हितधारकों के साथ समूह में कार्यशालाएं आयोजित करना।

2. आवश्यकताओं का विश्लेषण और मॉडलिंग (Requirements Analysis and Modeling)

इस चरण में एकत्रित आवश्यकताओं का विश्लेषण किया जाता है, ताकि यह समझा जा सके कि क्या ये आवश्यकताएँ व्यवहार्य हैं और क्या उन्हें पूर्ण करना संभव है। इसमें यह देखा जाता है कि कोई आवश्यकता अस्पष्ट या विरोधाभासी तो नहीं है। इसके अलावा, आवश्यकताओं को दृश्य रूप में मॉडलिंग भी किया जाता है, ताकि वे स्पष्ट हो सकें। यह मॉडलिंग निम्नलिखित तरीकों से की जा सकती है:

  • यूज़ केस डायग्राम (Use Case Diagram): यह उपयोगकर्ता के दृष्टिकोण से सॉफ़्टवेयर के कामकाज को प्रदर्शित करता है।
  • डेटा फ्लो डायग्राम (Data Flow Diagram): यह सॉफ़्टवेयर में डेटा के प्रवाह को समझने में मदद करता है।
  • एंटिटी-रिलेशनशिप डायग्राम (Entity-Relationship Diagram): यह सॉफ़्टवेयर में मौजूद डेटा की संरचना को दिखाता है।

3. आवश्यकताओं का स्पेसिफिकेशन (Requirements Specification)

स्पेसिफिकेशन का मतलब है कि आवश्यकताओं को सही तरीके से, स्पष्ट रूप से और बिना किसी प्रकार की अस्पष्टता के दस्तावेज में लिखा जाए। इस दस्तावेज को रिक्वायरमेंट्स स्पेसिफिकेशन डॉक्यूमेंट (Software Requirements Specification - SRS) कहा जाता है। यह दस्तावेज सॉफ़्टवेयर विकास टीम को एक मार्गदर्शक के रूप में उपयोगी होता है और विकास प्रक्रिया को सुचारू बनाने में मदद करता है। SRS में शामिल मुख्य बिंदु:

  • कार्यात्मक आवश्यकताएँ: सॉफ़्टवेयर में कौन-कौन से कार्य होने चाहिए।
  • गैर-कार्यात्मक आवश्यकताएँ: सॉफ़्टवेयर की प्रदर्शन, सुरक्षा, और उपयोगकर्ता अनुभव से संबंधित अपेक्षाएँ।
  • सिस्टम आवश्यकताएँ: सॉफ़्टवेयर को चलाने के लिए आवश्यक हार्डवेयर और सॉफ़्टवेयर।

4.आवश्यकताओं का सत्यापन और मान्यता (Requirements Validation and Verification)

यह चरण आवश्यकताओं के सत्यापन और मान्यता के लिए होता है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाता है कि आवश्यकताएँ सटीक, पूरी और व्यवहारिक हैं। इसमें निम्नलिखित क्रियाएँ शामिल होती हैं:

  • समीक्षा (Review): आवश्यकताओं को समीक्षा के लिए प्रस्तुत किया जाता है ताकि कोई गलती या अस्पष्टता न हो।
  • प्रोटोटाइपिंग (Prototyping): एक अस्थायी मॉडल बनाकर आवश्यकताओं की पुष्टि की जाती है।
  • प्रयोग और परीक्षण (Testing): यह जाँच की जाती है कि क्या आवश्यकताएँ व्यवहारिक रूप से पूरी हो सकती हैं।

Types of Requirement Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग के प्रकार :

रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग में आवश्यकताओं के विभिन्न प्रकार होते हैं:

  • कार्यात्मक आवश्यकताएँ (Functional Requirements): यह उन विशेषताओं और कार्यों को दर्शाती हैं, जो सॉफ़्टवेयर को करना चाहिए। उदाहरण के लिए, किसी बैंकिंग एप्लीकेशन में लॉगिन, बैलेंस चेक करना, फंड ट्रांसफर जैसी कार्यात्मक आवश्यकताएँ होती हैं।
  • गैर-कार्यात्मक आवश्यकताएँ (Non-functional Requirements): यह सॉफ़्टवेयर की गुणवत्ता, प्रदर्शन, सुरक्षा, और उपयोगकर्ता अनुभव से जुड़ी होती हैं। उदाहरण के लिए, सिस्टम की गति, सुरक्षा स्तर, उपयोगकर्ता इंटरफ़ेस का लचीलापन।
  • डोमेन आवश्यकताएँ (Domain Requirements): यह किसी विशेष डोमेन के लिए विशिष्ट होती हैं। उदाहरण के लिए, बैंकिंग सॉफ़्टवेयर में वित्तीय नियमों का पालन करना, मेडिकल सॉफ़्टवेयर में स्वास्थ्य मानकों का पालन करना।
Advantages of Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग के लाभ :

रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग के कई लाभ हैं, जो इसे सॉफ़्टवेयर विकास में अनिवार्य बनाते हैं:

  • सटीकता और पूर्णता: यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि आवश्यकताएँ पूरी तरह से समझी और परिभाषित की गई हैं, जिससे सॉफ़्टवेयर विकास में गलतियों की संभावना कम होती है।
  • प्रोजेक्ट का नियंत्रण: स्पष्ट आवश्यकताओं के कारण प्रोजेक्ट को नियंत्रित और प्रबंधित करना आसान हो जाता है।
  • उच्च गुणवत्ता और उपयोगकर्ता संतुष्टि: जब उपयोगकर्ता की सभी आवश्यकताओं को समझकर उन्हें सॉफ़्टवेयर में शामिल किया जाता है, तो यह अधिक संतोषजनक और गुणवत्ता युक्त होता है।
  • कम लागत और समय की बचत: अच्छी तरह से परिभाषित आवश्यकताओं के कारण प्रोजेक्ट में बार-बार बदलाव की आवश्यकता नहीं होती, जिससे समय और लागत में बचत होती है।

Challenges in Requirements Engineering in Hindi | रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग की चुनौतियाँ :

रिक्वायरमेंट्स इंजीनियरिंग एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें कई चुनौतियाँ भी होती हैं:

  • उपयोगकर्ता की अस्पष्ट आवश्यकताएँ: कई बार उपयोगकर्ता खुद भी यह नहीं जानते कि उन्हें वास्तव में क्या चाहिए।
  • प्राथमिकता निर्धारण: सभी आवश्यकताओं की प्राथमिकता तय करना एक कठिन कार्य होता है।
  • परिवर्तनशील आवश्यकताएँ: प्रोजेक्ट के दौरान आवश्यकताएँ बदल सकती हैं, जिससे कार्य को दोबारा करना पड़ता है।
  • हितधारकों के बीच विवाद: विभिन्न हितधारक अक्सर अलग-अलग अपेक्षाएँ रखते हैं, जो कभी-कभी परस्पर विरोधी हो सकती हैं।