BCA / B.Tech 12 min read

Copy with Change in Hindi

Copy with Change in  Hindi | सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में कॉपी विद चेंज 


  • सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में "कॉपी विद चेंज" (Copy with Change) एक ऐसी तकनीक है जिसमें मौजूदा सॉफ़्टवेयर कोड, डिज़ाइन या सिस्टम की नकल की जाती है और फिर उस पर कुछ विशेष आवश्यकताओं के आधार पर बदलाव किए जाते हैं। 
  • यह विधि आमतौर पर सॉफ़्टवेयर रीयूज़ (Software Reuse) और तेज़ी से नए सॉफ़्टवेयर वर्शन बनाने के लिए अपनाई जाती है।
  • "कॉपी विद चेंज" का उपयोग तब किया जाता है जब किसी मौजूदा सॉफ़्टवेयर के कुछ भागों को फिर से उपयोग में लेना हो, लेकिन उसी को बिना बदलाव के उपयोग करने से वांछित कार्यक्षमता प्राप्त नहीं होती। 
  • इस स्थिति में, मौजूदा सिस्टम को पूरी तरह से नया लिखने की बजाय उसमें छोटे बदलाव करके नए कार्यों को शामिल किया जाता है। इससे समय की बचत होती है और विकास लागत भी कम होती है।
  • "कॉपी विद चेंज" सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में एक महत्वपूर्ण तकनीक है जो सॉफ्टवेयर विकास प्रक्रिया को तेजी से और किफायती बनाती है। यह प्रणाली के पुनः उपयोग की क्षमता को बढ़ाता है और इसके माध्यम से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट टीम को समय और प्रयास की बचत होती है। 
  • हालांकि, इसके साथ यह भी जरूरी है कि इसका उपयोग समझदारी से किया जाए, ताकि डुप्लिकेशन और तकनीकी ऋण जैसी समस्याओं से बचा जा सके।


Importance of Copy with Change in Hindi | कॉपी विद चेंज का महत्व :

सॉफ़्टवेयर विकास में "कॉपी विद चेंज" का महत्व निम्नलिखित है:

  • समय की बचत: पहले से लिखे हुए कोड को फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे विकास तेजी से होता है।
  • लागत में कमी: पहले से मौजूद कोड और डिज़ाइन को दोबारा उपयोग करने से नए कोड लिखने की लागत कम हो जाती है।
  • गुणवत्ता में सुधार: मौजूदा कोड की गुणवत्ता पहले से ही परखी हुई होती है, जिससे नए सॉफ़्टवेयर की विश्वसनीयता बढ़ जाती है।
  • रिस्क में कमी: मौजूदा सिस्टम को पूरी तरह से बदलने से कई प्रकार के रिस्क हो सकते हैं। लेकिन, कॉपी विद चेंज का उपयोग करने से जोखिम कम हो जाता है।

Process of Copy with Change in Hindi | कॉपी विद चेंज की प्रक्रिया :

इस प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण शामिल होते हैं:

मौजूदा कोड या डिज़ाइन की पहचान: पहले मौजूदा सॉफ़्टवेयर सिस्टम में उन हिस्सों की पहचान की जाती है, जिनका पुनः उपयोग किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक इनवेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम के लिए ग्राहक डेटा प्रबंधन का मौजूदा कोड पहले से ही उपलब्ध हो सकता है।

कोड की नकल बनाना (Copy): आवश्यक मॉड्यूल या कम्पोनेंट्स को मूल प्रणाली से कॉपी कर लिया जाता है। यह कॉपी बनाए गए नए सिस्टम के आधार के रूप में काम करती है।

बदलाव की योजना: यह जानना आवश्यक है कि मौजूदा कोड में क्या बदलाव किए जाने हैं। इस स्टेप में, नए आवश्यकताओं के अनुसार बदलाव की योजना बनाई जाती है, ताकि मौजूदा कोड का अधिकतम पुनः उपयोग हो सके।

बदलाव का कार्यान्वयन: अब उन कोड या डिज़ाइन में परिवर्तन किए जाते हैं। जैसे नए फीचर्स जोड़ना, UI में बदलाव करना, डेटा प्रोसेसिंग का तरीका बदलना आदि।

पुनः परीक्षण (Testing): परिवर्तन करने के बाद, नए सिस्टम की परीक्षण किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि नए कार्य अपेक्षा के अनुसार कार्य कर रहे हैं।

रोलआउट और रखरखाव: यदि बदलाव सफल होते हैं, तो नए सॉफ़्टवेयर वर्शन को रोलआउट कर दिया जाता है और इसके प्रदर्शन की निगरानी की जाती है।

Advantages of Copy with Change in Hindi | कॉपी विद चेंज के फायदे :

  • रीयुजेबिलिटी (Reuse): मौजूदा कोड को पुनः उपयोग करने से विकास में तेजी आती है।
  • लचीलापन (Flexibility): इसे आसानी से अलग-अलग प्रोजेक्ट्स और नए उपयोगकर्ताओं के अनुसार अनुकूलित किया जा सकता है।
  • नवीनता में सुधार: मौजूदा सॉफ़्टवेयर में नई कार्यक्षमताएं जोड़ी जा सकती हैं, जिससे सिस्टम अधिक आधुनिक हो जाता है।

Disadvantages of Copy with Change in Hindi | कॉपी विद चेंज के नुकसान

  • तकनीकी ऋण (Technical Debt): बार-बार कॉपी विद चेंज करने से कोडबेस का आकार बढ़ता जाता है, जिससे इसे बनाए रखना कठिन हो जाता है।
  • डुप्लिकेशन (Duplication): सिस्टम में डुप्लिकेट कोड हो सकता है, जिससे विकास और रखरखाव की जटिलता बढ़ जाती है।
  • परफॉर्मेंस मुद्दे: कभी-कभी कॉपी किए गए कोड को बहुत अधिक अनुकूलित करने की जरूरत होती है, अन्यथा यह सिस्टम के प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है।

Examples of Copy with Change in Hindi | कॉपी विद चेंज के उदाहरण :

  • मोबाइल एप्लिकेशन का विकास: एक कंपनी ने एक ई-कॉमर्स ऐप विकसित किया है और अब उसे अन्य देशों के लिए भी अनुकूलित करना चाहती है। इसके लिए "कॉपी विद चेंज" का उपयोग किया जा सकता है, जिसमें मौजूदा कोड को कॉपी करके नए देशों के अनुसार आवश्यक बदलाव किए जाते हैं, 
  • जैसे कि भाषा, कर की गणना, मुद्रा इत्यादि।
  • कस्टमर रिलेशनशिप मैनेजमेंट (CRM) सिस्टम: एक संगठन अपने CRM सिस्टम को दूसरे डिपार्टमेंट के अनुसार अनुकूलित करना चाहता है। वे मौजूदा सिस्टम को कॉपी करके और आवश्यक बदलाव करके उसे दूसरे डिपार्टमेंट के अनुसार उपयोग कर सकते हैं।
  • इनवेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम: एक इनवेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम में प्रोडक्ट कैटलॉग का मौजूदा मॉड्यूल है। इसे एक नए सिस्टम में कॉपी किया जाता है और बदलाव करके इसे नए व्यवसाय की जरूरतों के अनुसार ढाल दिया जाता है।