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Chola Dynasty और South Indian Dynasties in Hindi: दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश: चोल, पल्लव, चालुक्य और उनकी कला

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लेखक Ratan Kumawat · संस्थापक, NotesMedia

प्रकाशित:

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: भारतीय इतिहास (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: Chola Dynasty और South Indian Dynasties in Hindi: दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश: चोल, पल्लव, चालुक्य और उनकी कला - प्राचीन भारत: प्रमुख स्थल, कला और संस्कृति
  • • अवलोकन: Quick Answer: Chola Dynasty और South Indian Dynasties in Hindi: दक्षिण भारत के इतिहास में पल्लव, बादामी के चालुक्य और चोल राजवंशों का काल राजनीतिक संघर्...
Quick Answer: Chola Dynasty और South Indian Dynasties in Hindi: दक्षिण भारत के इतिहास में पल्लव, बादामी के चालुक्य और चोल राजवंशों का काल राजनीतिक संघर्ष और बेजोड़ द्रविड़ व वेसर स्थापत्य कला का स्वर्ण युग रहा। पल्लवों (राजधानी कांचीपुरम) ने मामल्लापुरम में एकाश्मक पंचरथ और तट मंदिर (Shore Temple) बनाए। बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने सम्राट हर्ष को हराकर नर्मदा पर रोका, जिसका वर्णन रविकीर्ति की ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.) में है। 9वीं से 13वीं सदी में चोल साम्राज्य नौसैनिक शक्ति और स्थानीय स्वशासन के शिखर पर पहुंचा। परांतक प्रथम के उत्तरमेरुर अभिलेख (919 व 921 ई.) में ग्राम सभाओं की चुनाव लॉटरी व्यवस्था (कुदावोलाई) का जीवंत वर्णन है। राजराज प्रथम का तंजावुर बृहदीश्वर मंदिर UNESCO विश्व धरोहर (Great Living Chola Temples) है और चोल कांस्य नटराज प्रतिमाएं धातु कला का शिखर मानी जाती हैं।
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1. दक्षिण भारत की त्रिपक्षीय राजनीतिक पृष्ठभूमि (Early Medieval South Indian Polity)

छठी से दसवीं शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत (कृष्णा और कावेरी नदियों के बीच) में सत्ता के लिए तीन प्रमुख राजवंशों—कांची के पल्लव, बादामी (वातापी) के चालुक्य (शुरुआती चालुक्य; 'पश्चिमी चालुक्य' नाम आमतौर पर बाद के कल्याणी चालुक्यों के लिए आता है) और मदुरै के पांड्य के बीच निरंतर संघर्ष चला। इसके बाद नौवीं शताब्दी में शाही चोल वंश (Imperial Cholas) का पुनरोदय हुआ जिसने पूरे दक्षिण भारत, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया पर अपनी नौसैनिक और सांस्कृतिक धाक जमाई।

राजवंश राजधानी और भौगोलिक क्षेत्र संस्थापक और प्रतापी शासक प्रमुख स्थापत्य और ऐतिहासिक स्मारक
पल्लव वंश कांचीपुरम (तमिलनाडु), तोंडाइमंडलम क्षेत्र सिंहविष्णु (वास्तविक संस्थापक); महेंद्रवर्मन प्रथम, नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल' महाबलीपुरम के एकाश्मक पंचरथ मंदिर, गंगावतरण (अर्जुन की तपस्या) शैल-उत्कीर्णन, मामल्लापुरम का तट मंदिर (Shore Temple) और कांची का कैलाशनाथ मंदिर।
बादामी के चालुक्य वातापी / बादामी (बागलकोट, कर्नाटक) पुलकेशिन प्रथम (संस्थापक); पुलकेशिन द्वितीय (610–642 ई.) ऐहोल प्रशस्ति (रविकीर्ति रचित), बादामी की गुफाएं, पट्टडकल के मंदिर (UNESCO धरोहर, 1987 - विरुपाक्ष मंदिर), ऐहोल का लाड खां और दुर्गा मंदिर।
शाही चोल साम्राज्य तंजावुर, बाद में गंगैकोंडचोलपुरम (तमिलनाडु) विजयालय (850 ई.); राजराज प्रथम (985–1014 ई.), राजेंद्र प्रथम (1014–1044 ई.) तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर (1010 ई., ग्रेनाइट विमान), उत्तरमेरुर अभिलेख (स्थानीय स्वशासन), लुप्त-मोम पद्धति से निर्मित कांस्य नटराज मूर्तियां।

2. कांची के पल्लव: राजनीतिक उपलब्धियां और स्थापत्य विकास (The Pallavas of Kanchi)

पल्लव शासकों ने दक्षिण भारतीय द्रविड़ स्थापत्य कला की सुदृढ़ नींव रखी:

  • महेंद्रवर्मन प्रथम (600–630 ई.): यह विद्वान और वास्तुकार था जिसने संस्कृत में हास्य नाटक 'मत्तविलास प्रहसन' लिखा। इसने चट्टानों को काटकर पिलरयुक्त गुहा मंदिर (मंडप) बनवाए।
  • नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल' (630–668 ई.): इसने चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को परास्त कर बादामी जीती और 'वातापीकोंड' की उपाधि ली। ह्वेनसांग ने इसके समय कांची की यात्रा की।
    • मामल्लपुरम के पंचरथ: इसने मामल्लापुरम (महाबलीपुरम) में ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर एकाश्मक रथ मंदिर (धर्मराज, भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, द्रौपदी रथ) बनवाए।
    • गंगावतरण: महाबलीपुरम में विशाल शिलाखंडों पर भागीरथ की तपस्या और गंगा अवतरण का खुला पाषाण उत्कीर्णन है।
  • पत्थर जोड़कर बने (structural) मंदिर: नरसिंहवर्मन द्वितीय 'राजसिंह' ने महाबलीपुरम का तटीय मंदिर (Shore Temple) और कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर बनवाया।

3. बादामी के चालुक्य और सम्राट पुलकेशिन द्वितीय (Chalukyas of Badami & Pulakeshin II)

बादामी के चालुक्यों का सबसे प्रतापी सम्राट पुलकेशिन द्वितीय (610–642 ई.) था:

  • ऐहोल प्रशस्ति: कर्नाटक के ऐहोल स्थित मेगुती जैन मंदिर में उत्कीर्ण यह संस्कृत प्रशस्ति पुलकेशिन के दरबारी कवि रविकीर्ति ने 634 ईस्वी में रची थी।
  • हर्षवर्धन की पराजय: नर्मदा क्षेत्र में पुलकेशिन द्वितीय ने उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन को हराया, जिसके बाद नर्मदा दोनों साम्राज्यों की सीमा बनी। तारीख पर मतभेद है: ज्यादातर इतिहासकार लगभग 618-619 ई. मानते हैं, कुछ 630-634 ई.; पक्का इतना है कि यह 634 ई. (ऐहोल प्रशस्ति) से पहले हुआ। ह्वेनसांग ने भी हर्ष की इस हार का जिक्र किया है।
  • चालुक्य वास्तुकला (वेसर शैली): नागर और द्रविड़ शैलियों के मिश्रण को वेसर (Vesara) शैली कहा जाता है। ऐहोल को 'भारतीय मंदिर स्थापत्य का पालना' कहते हैं (लाड खां मंदिर)। पट्टडकल का विरुपाक्ष मंदिर (8वीं सदी, विक्रमादित्य द्वितीय की रानी लोकमहादेवी ने बनवाया, द्रविड़ शैली) इस काल की सबसे बड़ी कृति मानी जाती है।

4. शाही चोल साम्राज्य: विजय अभियान और नौसैनिक शक्ति (Imperial Cholas: Expansion & Navy)

विजयालय ने 850 ईस्वी में तंजावुर जीतकर चोल साम्राज्य स्थापित किया गया। चोलों की प्रमुख उपलब्धियां:

  1. राजराज प्रथम (985–1014 ई.):
    • नौसेना के बल पर उत्तरी श्रीलंका और मालदीव ('प्राचीन 12,000 द्वीप') जीते और भू-राजस्व सर्वेक्षण कराया।
    • तंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर: 1010 ईस्वी में भगवान शिव को समर्पित बृहदीश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) बनवाया। यह ग्रेनाइट से बना है और इसका विमान लगभग 66 मीटर (करीब 216 फीट) ऊंचा है, जिसमें 13 तल (tiers) हैं। शिखर के ऊपर का पत्थर करीब 80 टन का बताया जाता है (पर यह एक ही पत्थर है या कई टुकड़े, इस पर मतभेद है)।
  2. राजेंद्र प्रथम (1014–1044 ई.):
    • संपूर्ण श्रीलंका को जीता और उत्तर भारत में गंगा घाटी तक अभियान चलाकर 'गंगैकोंडचोल' की उपाधि ली और नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम बसाई।
    • 1025 ई. के आसपास दक्षिण-पूर्व एशिया के श्रीविजय साम्राज्य (सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप; कडारम/केडाह) पर नौसैनिक हमला कर समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित किए।

5. चोल स्थानीय स्वशासन (उत्तरमेरुर अभिलेख) और कांस्य मूर्तिकला (Local Self-Government & Nataraja Bronzes)

चोल प्रशासन का सबसे गौरवशाली और लोकतांत्रिक पक्ष उनका ग्रामीण स्थानीय स्वशासन था, जिसकी विस्तृत नियमावली तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले में स्थित उत्तरमेरुर के दो अभिलेखों (919 ईस्वी और 921 ईस्वी, चोल राजा परांतक प्रथम के समय) की दीवारों पर उत्कीर्ण है:

ग्राम सभा / संस्था बनावट और सदस्यता कार्यपद्धति और समितियां (वरियम)
ऊर (Ur) सामान्य करदाता किसानों और भूस्वामियों की पारंपरिक ग्राम सभा। गांव की सामूहिक भूमि, सड़कों और तालाबों का दैनिक रख-रखाव।
सभा या महासभा ब्राह्मणों को दान दिए गए कर-मुक्त गांवों (ब्रह्मदेय) की विद्वान अग्रहार सभा। पूर्ण स्वायत्त संस्था, जो न्याय, कर संग्रहण, सिंचाई और शिक्षा का प्रबंधन करती थी।
नगरम (Nagaram) व्यापारियों, साहूकारों और शिल्पियों की शहरी वाणिज्यिक संस्था। हाट-बाजार, व्यापारिक चुंगी और आंतरिक सुरक्षा का नियंत्रण।

कुदावोलाई व्यवस्था (Kudavolai Election System): उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार गांव 30 वार्डों (कुडुम्बु) में बंटा था। विभिन्न प्रशासनिक समितियों—वरियम (Variyam) जैसे एरी वरियम (तालाब व सिंचाई समिति), तोट्ट वरियम (उद्यान समिति), पोन वरियम (स्वर्ण समिति) के लिए सदस्यों का चयन एक पारदर्शी लॉटरी व्यवस्था से होता था:

  • पद्धति: योग्य उम्मीदवारों के नाम ताड़ के पत्तों की पर्चियों पर लिखकर एक घड़े (कुडम) में डाले जाते थे। सभा के सामने एक अबोध बालक से पर्ची निकाली जाती थी।
  • कठोर अर्हताएं: उम्र 35 से 70 वर्ष के बीच हो (ज्यादातर किताबों के अनुसार); कम से कम 1/4 वेली कर वाली भूमि का मालिक हो; अपनी जमीन पर बने घर में रहता हो; वैदिक मंत्र-ब्राह्मण का ज्ञाता हो (कम जमीन होने पर एक वेद और भाष्य जानने वाले को छूट)।
  • अयोग्यताएं: जो पिछले 3 वर्षों में किसी समिति में रहा हो; जिसने पिछले कार्यकाल का हिसाब न दिया हो (और उसके करीबी रिश्तेदार); जो गंभीर पाप या अपराध का दोषी हो।

चोल कांस्य मूर्तिकला (Lost-Wax Nataraja): चोल काल में धातु ढलाई (लुप्त-मोम तकनीक / Cire perdue) अपने चरमोत्कर्ष पर थी। इसमें नटराज (भगवान शिव का आनंद तांडव स्वरूप) की कांस्य प्रतिमा विश्व प्रसिद्ध है। इसमें शिव चार भुजाओं वाले हैं: ऊपरी दाएं हाथ में डमरू (सृष्टि), ऊपरी बाएं हाथ में अग्नि (विनाश), निचला दायां हाथ अभय मुद्रा (रक्षा), और निचला बायां हाथ उठे हुए पैर की ओर इशारा (मोक्ष का मार्ग)। शिव अज्ञानता और अहंकार के प्रतीक 'अपस्मार पुरुष' (बौने दैत्य) को अपने दाएं पैर से दबाते हुए अग्नि चक्र (प्रभामंडल) के भीतर नृत्य कर रहे हैं।

नागर शैली के राजस्थानी मंदिरों से तुलना के लिए राजस्थान का स्थापत्य, मूर्तिशिल्प और चित्रशैलियां पढ़ें।

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Facts)

  • पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल' ने महाबलीपुरम के विश्व प्रसिद्ध एकाश्मक 'पंचरथ मंदिरों' का निर्माण कराया था।
  • चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय के दरबारी कवि रविकीर्ति ने संस्कृत में 'ऐहोल प्रशस्ति' लिखी, जिसमें सम्राट हर्ष की पराजय का उल्लेख है।
  • चोल सम्राट राजराज प्रथम ने 1010 ईस्वी में तंजावुर का 'बृहदीश्वर मंदिर' पूरा कराया (विमान लगभग 66 मीटर / 216 फीट)।
  • चोल राजा परांतक प्रथम के 'उत्तरमेरुर अभिलेख' (919 व 921 ई.) में प्राचीन भारत के लोकतांत्रिक ग्रामीण स्थानीय स्वशासन का विस्तृत विवरण है।
  • चोल कांस्य मूर्तियों में चतुर्भुज 'नटराज शिव' की प्रतिमा धातु शिल्प की लुप्त-मोम (Lost-wax) तकनीक का विश्व स्तरीय शिखर है।

RAS Prelims MCQ

  1. प्राचीन भारत में ग्रामीण स्थानीय स्वशासन और ग्राम सभाओं के चुनाव की 'कुदावोलाई' (लॉटरी) व्यवस्था का विस्तृत विवरण किस अभिलेख से प्राप्त होता है?
    A) ऐहोल अभिलेख
    B) उत्तरमेरुर अभिलेख (तमिलनाडु)
    C) जूनागढ़ अभिलेख
    D) प्रयाग प्रशस्ति
    उत्तर: B) उत्तरमेरुर अभिलेख (तमिलनाडु)
    कारण: चोल शासक परांतक प्रथम के 919 और 921 ई. के उत्तरमेरुर अभिलेखों में ग्राम समितियों (वरियम) के चुनाव और योग्यताओं का पूर्ण नियमन है।
  2. तंजावुर स्थित विश्व धरोहर 'बृहदीश्वर मंदिर' (राजराजेश्वर मंदिर) का निर्माण किस चोल सम्राट ने कराया था?
    A) विजयालय
    B) राजराज प्रथम (Rajaraja I)
    C) राजेंद्र प्रथम
    D) कुलोत्तुंग प्रथम
    उत्तर: B) राजराज प्रथम (Rajaraja I)
    कारण: राजराज प्रथम ने 1010 ईस्वी में भगवान शिव को समर्पित पूर्णतः ग्रेनाइट पाषाण से निर्मित बृहदीश्वर मंदिर बनवाया था।
  3. मेगुती जैन मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण 'ऐहोल प्रशस्ति' का रचयिता जैन कवि रविकीर्ति किस चालुक्य सम्राट का दरबारी कवि था?
    A) पुलकेशिन प्रथम
    B) विक्रमादित्य प्रथम
    C) पुलकेशिन द्वितीय (Pulakeshin II)
    D) कीर्तिवर्मन द्वितीय
    उत्तर: C) पुलकेशिन द्वितीय (Pulakeshin II)
    कारण: रविकीर्ति ने 634 ईस्वी में ऐहोल प्रशस्ति में पुलकेशिन द्वितीय की उपलब्धियों और हर्षवर्धन पर उसकी जीत का वर्णन किया।
  4. महाबलीपुरम (मामल्लापुरम) के समुद्र तटीय शैलकृत 'एकाश्मक पंचरथ मंदिरों' का निर्माण किस पल्लव शासक के शासनकाल में हुआ था?
    A) महेंद्रवर्मन प्रथम
    B) नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल'
    C) नरसिंहवर्मन द्वितीय 'राजसिंह'
    D) नंदीवर्मन
    उत्तर: B) नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल'
    कारण: मामल्लपुरम का नाम नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल' की उपाधि से पड़ा; पंचरथ आमतौर पर उसी के समय के माने जाते हैं।
  5. उत्तर भारत के गंगा घाटी क्षेत्र तक सफल सैन्य अभियान चलाकर 'गंगैकोंडचोल' की उपाधि धारण करने वाला प्रतापी चोल शासक कौन था?
    A) राजराज प्रथम
    B) राजेंद्र प्रथम (Rajendra I)
    C) परांतक प्रथम
    D) अधिराजेंद्र
    उत्तर: B) राजेंद्र प्रथम (Rajendra I)
    कारण: राजेंद्र प्रथम ने पाल शासक महीपाल को हराकर गंगैकोंडचोलपुरम राजधानी बसाई और चोलगंगम झील बनवाई।
  6. चोल कालीन कांस्य नटराज प्रतिमा में भगवान शिव के पैर के नीचे दबे हुए बौने दैत्य (अपस्मार) का क्या दार्शनिक प्रतीक है?
    A) अहंकार और अज्ञानता (Ignorance)
    B) भौतिक मृत्यु
    C) प्राकृतिक आपदा
    D) गरीबी
    उत्तर: A) अहंकार और अज्ञानता (Ignorance)
    कारण: नटराज प्रतिमा में अपस्मार पुरुष मानवीय अज्ञानता और मोह-माया का प्रतीक है जिसे शिव ज्ञान के पैर से कुचलते हैं।
  7. संस्कृत के प्रसिद्ध व्यंग्य नाटक 'मत्तविलास प्रहसन' के रचयिता कौन से पल्लव सम्राट थे?
    A) महेंद्रवर्मन प्रथम (Mahendravarman I)
    B) सिंहविष्णु
    C) नरसिंहवर्मन प्रथम
    D) दंतिवर्मन
    उत्तर: A) महेंद्रवर्मन प्रथम (Mahendravarman I)
    कारण: पल्लव नरेश महेंद्रवर्मन प्रथम बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उन्होंने कापालिकों व बौद्धों के पाखंड पर मत्तविलास प्रहसन लिखा।
  8. चोल प्रशासन में ब्राह्मणों को दान में दिए गए कर-मुक्त गांवों की स्वायत्त शासकीय सभा को क्या कहा जाता था?
    A) ऊर
    B) सभा या महासभा (Mahasabha)
    C) नगरम
    D) पुग
    उत्तर: B) सभा या महासभा (Mahasabha)
    कारण: ब्रह्मदेय गांवों की प्रबंधन सभा को 'सभा' या 'महासभा' कहा जाता था जिसके सदस्य ब्राह्मण भूस्वामी होते थे।
  9. चालुक्य वास्तुकला की उस मिश्रित शैली को क्या कहा जाता है जिसमें उत्तर भारतीय नागर और दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैलियों का समन्वय हुआ?
    A) पंचायतन शैली
    B) वेसर शैली (Vesara Style)
    C) गंधार शैली
    D) कलिंग शैली
    उत्तर: B) वेसर शैली (Vesara Style)
    कारण: दक्कन में चालुक्यों की विकसित मिश्रित मंदिर वास्तुकला को वेसर शैली कहा जाता है (उदा. ऐहोल व पट्टडकल के मंदिर)।
  10. दक्षिण-पूर्व एशिया के शक्तिशाली 'श्रीविजय साम्राज्य' (सुमात्रा-मलय) पर 11वीं सदी में किस भारतीय नौसैनिक शक्ति ने विजय प्राप्त की थी?
    A) पल्लव नौसेना
    B) चालुक्य नौसेना
    C) चोल साम्राज्य (राजेंद्र प्रथम की नौसेना)
    D) मराठा नौसेना
    उत्तर: C) चोल साम्राज्य (राजेंद्र प्रथम की नौसेना)
    कारण: तंजावुर अभिलेख के अनुसार राजेंद्र प्रथम की नौसेना ने लगभग 1025 ई. में श्रीविजय के राजा संग्राम विजयोत्तुंगवर्मन को बंदी बनाया और कडारम पर कब्जा किया।
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RAS Mains Questions

Exam के लिए Important Questions नीचे दिए गए हैं:

Short Questions (2–3 marks)

  1. उत्तरमेरुर अभिलेख के अनुसार चोल ग्राम समिति (वरियम) चुनाव की 'कुदावोलाई' पद्धति क्या थी? (20 शब्द)
    उत्तर: योग्य प्रत्याशियों के नाम ताड़पत्रों पर लिखकर मटके में डाले जाते थे और एक अबोध बालक से लॉटरी निकालकर विभिन्न कार्यकारी समितियों के सदस्य चुने जाते थे।
  2. चोल कांस्य नटराज प्रतिमा के चतुर्भुज स्वरूप का क्या आध्यात्मिक अर्थ है? (20 शब्द)
    उत्तर: ऊपरी दायां हाथ (डमरू - सृष्टि), ऊपरी बायां हाथ (अग्नि - विनाश), निचला दायां हाथ (अभय मुद्रा - संरक्षण), और निचला बायां हाथ (मोक्ष का मार्ग)।
  3. पल्लव कालीन 'एकाश्मक रथ' (Monolithic Rathas) क्या हैं? (20 शब्द)
    उत्तर: महाबलीपुरम में समुद्र तट पर ग्रेनाइट की अकेली चट्टानों को तराशकर बनाए गए 5 मंदिर, जिन्हें पांडवों और द्रौपदी के नाम पर पंचरथ कहा जाता है।
  4. ऐहोल प्रशस्ति का ऐतिहासिक महत्व क्या है? (20 शब्द)
    उत्तर: रविकीर्ति रचित यह प्रशस्ति (634 ई.) पुलकेशिन द्वितीय की जीतों, खासकर सम्राट हर्ष की हार, का मुख्य समकालीन साक्ष्य है; ह्वेनसांग भी इस हार का जिक्र करता है।
  5. चोल प्रशासन में 'ऊर', 'सभा' और 'नगरम' में क्या अंतर था? (20 शब्द)
    उत्तर: ऊर आम किसानों की सभा थी, सभा/महासभा ब्रह्मदेय गांवों के ब्राह्मणों की सभा थी, और नगरम व्यापारियों व शिल्पियों की वाणिज्यिक संस्था थी।

Long Questions (5–10 marks)

  1. उत्तरमेरुर अभिलेख के प्रकाश में चोल स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) की कार्यव्यवस्था, लोकतांत्रिक विशेषताओं और प्रशासनिक सीमाओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (100 शब्द)
    उत्तर: चोल स्थानीय स्वशासन मध्यकालीन विश्व की अनोखी लोकतांत्रिक संस्था थी:
    1. स्वायत्त और विकेंद्रीकृत स्वरूप: महासभा को कर निर्धारण, न्याय, भूमि विवाद सुलझाने और सार्वजनिक निर्माण का पूर्ण अधिकार था; राजा का हस्तक्षेप न्यूनतम था।
    2. विशिष्ट कार्य समितियां (वरियम): सिंचाई (एरी वरियम), बागवानी (तोट्ट वरियम) और वित्तीय ऑडिट के लिए विषय विशेषज्ञ समितियां थीं।
    3. पारदर्शी चुनाव व नैतिक योग्यताएं: 'कुदावोलाई' लॉटरी पद्धति में भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं थी। न्यूनतम भूमि, उम्र (35-70 वर्ष), वेदों के ज्ञान के साथ वित्तीय निष्पक्षता अनिवार्य थी। पूर्व कार्यकाल का हिसाब न देने वाले अयोग्य थे।
    4. सीमाएं: यह व्यवस्था सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार नहीं थी; केवल संपत्तिशाली, उच्च वर्ण (विशेषतः ब्राह्मण) और पुरुष ही सदस्य बन सकते थे, दलितों व भूमिहीनों का प्रतिनिधित्व नहीं था। इसके बावजूद यह स्थानीय लोकतंत्र का ऐतिहासिक प्रतिमान था।
  2. द्रविड़ मंदिर वास्तुकला के क्रमिक विकास में पल्लव और चोल राजवंशों के कलात्मक योगदान का तुलनात्मक परीक्षण कीजिए। (100 शब्द)
    उत्तर: द्रविड़ स्थापत्य का विकास पल्लवों से प्रारंभ होकर चोलों के काल में पराकाष्ठा पर पहुंचा:
    1. पल्लव स्थापत्य (नींव का काल):
    - गुहा मंदिरों से एकाश्मक रथ: महेंद्रवर्मन के रॉक-कट मंडप से बढ़कर मामल्लपुरम में ठोस ग्रेनाइट को तराशकर एकाश्मक पंचरथ (धर्मराज रथ, द्रौपदी रथ) बनाए गए।
    - पत्थर जोड़कर बने (structural) मंदिर: राजसिंह ने पत्थरों को जोड़कर तट मंदिर (Shore Temple) और कांची का कैलाशनाथ मंदिर बनवाया, जिसमें विमान, गर्भगृह और प्राकार की नींव पड़ी।
    2. चोल स्थापत्य (भव्यता और चरमोत्कर्ष):
    - विशाल पिरामिडनुमा विमान: चोलों ने गोपुरम से अधिक महत्व मुख्य गर्भगृह के ऊपर बहुमंजिला विशाल विमान को दिया। तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर का 13 तल वाला विमान (लगभग 66 मीटर) ग्रेनाइट का अनोखा स्थापत्य है।
    - विस्तृत प्रांगण व नंदी मंडप: विशाल चारदीवारी, नक्काशीदार पिलरयुक्त मंडप और गर्भगृह के आगे विशाल एकाश्मक नंदी की स्थापना।
    - धातु शिल्प: चोल कांस्य नटराज की मूर्तियां धातु कला में गतिशीलता और आध्यात्मिक संतुलन का विश्व शिखर बनीं।

FAQs

प्रश्न: तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के शीर्ष पर कितने टन का पत्थर रखा गया है?
उत्तर: लोकप्रिय विवरणों में शिखर के ऊपर के पत्थर (शिखरम्) का वजन करीब 80 टन बताया जाता है और कहा जाता है कि इसे लंबे मिट्टी के ramp से ऊपर चढ़ाया गया। पर यह एक ही पत्थर है या कई टुकड़े, और ramp कितना लंबा था, इसका पक्का प्रमाण नहीं है।

प्रश्न: क्या चोल काल में महिलाओं को ग्राम सभा का सदस्य बनने का अधिकार था?
उत्तर: उत्तरमेरुर अभिलेख की शर्तें (जमीन, घर, वेद ज्ञान) पुरुष भूस्वामियों को ध्यान में रखकर लिखी गई थीं; समितियों में महिलाओं की सदस्यता का कोई उल्लेख नहीं मिलता।

प्रश्न: कांची का कैलाशनाथ मंदिर किस पल्लव राजा ने बनवाया था?
उत्तर: कांचीपुरम का कैलाशनाथ मंदिर पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय 'राजसिंह' ने 8वीं शताब्दी के प्रारंभ में बनवाया था।

प्रश्न: ऐहोल को 'भारतीय मंदिर वास्तुकला का पालना' क्यों कहा जाता है?
उत्तर: क्योंकि यहां शुरुआती चालुक्य काल के 120 से ज्यादा पत्थर और गुफा मंदिर हैं, जिनमें नागर और द्रविड़ दोनों शैलियों के शुरुआती प्रयोग दिखते हैं।

प्रश्न: राजेंद्र प्रथम ने 'गंगैकोंडचोलपुरम' नगर की स्थापना क्यों की थी?
उत्तर: उत्तर भारत में गंगा नदी तक विजय अभियान चलाकर पाल शासक महीपाल को हराने की ऐतिहासिक स्मृति में राजेंद्र प्रथम ने यह नई राजधानी बसाई थी।

परीक्षा के लिए याद रखें

  • मत्तविलास प्रहसन: पल्लव राजा महेंद्रवर्मन प्रथम।
  • महाबलीपुरम के पंचरथ: नरसिंहवर्मन प्रथम 'मामल्ल'; तट मंदिर और कैलाशनाथ मंदिर: राजसिंह।
  • ऐहोल प्रशस्ति (634 ई.): रविकीर्ति, मेगुती जैन मंदिर, पुलकेशिन द्वितीय।
  • बृहदीश्वर मंदिर, तंजावुर: राजराज प्रथम, 1010 ई.।
  • गंगैकोंडचोल उपाधि और श्रीविजय अभियान (लगभग 1025 ई.): राजेंद्र प्रथम।
  • उत्तरमेरुर अभिलेख (919 व 921 ई.): परांतक प्रथम, कुदावोलाई (लॉटरी) चुनाव, 30 वार्ड।
  • ऊर: आम गांव सभा; सभा/महासभा: ब्रह्मदेय गांव; नगरम: व्यापारी।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Quick Answer: Chola Dynasty और South Indian Dynasties in Hindi: दक्षिण भारत।
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