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Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय: दादू, जसनाथी, विश्नोई, रामस्नेही और मीरा

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लेखक Ratan Kumawat · संस्थापक, NotesMedia

प्रकाशित:

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: राजस्थान का इतिहास और संस्कृति (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय: दादू, जसनाथी, विश्नोई, रामस्नेही और मीरा - साहित्यिक राजस्थान (भाषा और लेखक)
  • • अवलोकन: Quick Answer: Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय (rajasthan ke sant aur sampraday) मध्यकालीन समाज सुधार और भक्ति आंदोलन के मुख...
Quick Answer: Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय (rajasthan ke sant aur sampraday) मध्यकालीन समाज सुधार और भक्ति आंदोलन के मुख्य आधार रहे हैं। निर्गुण पंथ में दादू दयाल ने नरेना में दादू पंथ, जाम्भोजी ने 29 नियमों से विश्नोई संप्रदाय, जसनाथजी ने 36 नियमों से जसनाथी संप्रदाय और संत रामचरणजी ने शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय बनाया। सगुण भक्ति में मीराबाई ने कांता भाव से गिरधर गोपाल की उपासना की। मेवात में संत लालदासजी (लालदासी संप्रदाय) व चरणदासजी, वागड़ में संत मावजी, खींची शासक संत पीपाजी और कृषक संत धन्नाजी ने समरसता, पर्यावरण सुरक्षा और सदाचार की नई राह दिखाई।

राजस्थान के संत और संप्रदाय: पृष्ठभूमि, स्वरूप और भक्ति आंदोलन का प्रभाव

मध्यकालीन राजस्थान में 15वीं से 17वीं सदी में समाज सुधार और भक्ति चेतना का बड़ा प्रसार हुआ। स्थानीय संतों ने पाखंड, जाति भेद और बाह्य आडंबरों को नकारकर जनभाषा में ईश्वर प्रेम सिखाया। राजस्थान के संत और संप्रदाय (rajasthan ke sant aur sampraday) ने समाज को नई नैतिक दिशा दी। भक्ति की दो धाराएं मुख्य रहीं:

  • निर्गुण भक्ति धारा: निराकार परब्रह्म की उपासना, मूर्ति पूजा त्याग और नाम सुमिरन। दादू दयाल, जाम्भोजी, जसनाथजी, लालदासजी और रामस्नेही संत इसके अगुआ थे।
  • सगुण भक्ति धारा: साकार रूप और लीलाओं की प्रेममयी उपासना। भक्त शिरोमणि मीराबाई इसकी सर्वोच्च प्रतीक बनीं। चरणदासजी ने दोनों धाराओं का समन्वय किया।

दुर्गों व कला के लिए देखें: Art and Culture of Rajasthan। लोक नृत्यों के लिए पढ़ें: Folk Arts, Dances, Drama and Instruments। वर्तमान में राजस्थान 41 जिलों और 7 संभागों में बंटा है, जहां इन संतों के पावन धाम हैं।

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संत दादू दयाल और दादू पंथ: नरेना पीठ, अलख दरीबा और प्रमुख शिष्य

संत दादू दयाल (1544–1603 ई.) को उदार विचारों से 'राजस्थान का कबीर' कहा जाता है। 1544 ईस्वी में अहमदाबाद में जन्मे दादू जी के गुरु बुड्ढन बाबा (वृद्धानंद / ब्रह्मानंद) माने जाते हैं। सांभर में इन्होंने उपदेश देना और शिष्य बनाना शुरू किया; 1574 ईस्वी में सांभर में दादू पंथ की नींव मानी जाती है। पंथ की परंपरा के अनुसार 1585 ईस्वी में आमेर के राजा भगवंत दास के साथ फतेहपुर सीकरी में अकबर से मिले। 1603 ईस्वी में नरेना (आज जयपुर जिला; दूदू जिला दिसंबर 2024 में खत्म हुआ) में देह त्यागी; भैराणा पहाड़ी की गुफा 'दादू खोल' कहलाती है।

  • मुख्य पीठ और अलख दरीबा: नरेना में प्रधान गद्दी है। मूर्ति पूजा नहीं होती; 'दादू वाणी' पूजी जाती है। सत्संग स्थल 'अलख दरीबा' कहलाता है। शव को खुले जंगल में छोड़ते हैं ताकि जीवों का पेट भर सके।
  • साहित्य: ढूंढाड़ी में 'दादू दयाल री वाणी' और 'दादू रा दूहा' मुख्य हैं। रज्जब जी ने संपादन 'अंगवधू' नाम से किया।
  • 52 प्रमुख शिष्य (52 थांभ): दादू जी के 52 शिष्यों ने 52 शाखाएं बनाईं, जिन्हें '52 थांभ' कहते हैं:
    • संत रज्जब जी: विवाह मार्ग पर विरक्त होकर जीवन भर दूल्हे के वेश में रहे। ग्रंथ: 'सरबंगी' और 'रज्जब वाणी'।
    • संत सुंदरदास जी: सबसे विद्वान, 'दादू पंथ का शंकराचार्य' कहलाए। 'सुंदर विलास' रचा और 'नागा शाखा' बनाई।
    • संत बालिंद जी व जनगोपाल: बालिंद वाणी और 'श्री दादू जनम लीला परची' के रचयिता।
  • पंथ की 5 शाखाएं: खालसा (नरेना गद्दी), नागा (हथियारधारी), विरक्त (घूमंतू), उत्तरादे (उत्तर भारत) और खाकी (भस्मधारी)।

संत जाम्भोजी और विश्नोई संप्रदाय: 29 नियम, पर्यावरण चेतना और मुक्तिधाम मुकाम

संत जाम्भोजी (1451–1536 ई.) पर्यावरण संरक्षण के प्रणेता थे। जन्म 1451 ईस्वी में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को पीपासर (नागौर) में पंवार राजपूत लोहट जी और हंसा देवी के घर हुआ। बचपन का नाम धनराज था। बचपन में बहुत कम बोलने के कारण लोग इन्हें 'गूंगा-गहला' कहते थे।

1485 ईस्वी में समराथल धोरा (बीकानेर) पर पाहल संस्कार कर इन्होंने 29 नियमों वाला विश्नोई संप्रदाय बनाया।

  • पर्यावरण दर्शन: जीव दया और हरे पेड़ (खासकर खेजड़ी) न काटना 29 नियमों का मूल है। समाज काले हिरण और चिंकारा को बच्चों समान पालता है।
  • खेजड़ली बलिदान (1730 ई.): जोधपुर राजा अभयसिंह के समय अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने खेजड़ी पेड़ों की रक्षा में शीश कटा दिए। अमृता देवी से जुड़ी यह line प्रसिद्ध है - "सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण"। भाद्रपद शुक्ल दशमी को खेजड़ली में विश्व का अनूठा वृक्ष मेला भरता है।
  • प्रभाव व तीर्थ: परंपरा के अनुसार सिकंदर लोदी भी इनसे प्रभावित हुआ था। 1536 ईस्वी में लालासर (बीकानेर) में निर्वाण हुआ। मुख्य समाधि मुकाम (नोखा, बीकानेर) में है जहां आश्विन और फाल्गुन अमावस्या को मेला लगता है। ग्रंथ: 'जंभसागर' और '120 शब्दवाणी'।

संत जसनाथजी और जसनाथी संप्रदाय: 36 नियम, अग्नि नृत्य और कतरियासर पीठ

संत जसनाथजी (1482–1506 ई.) का जन्म 1482 ईस्वी में कार्तिक शुक्ल एकादशी को कतरियासर (बीकानेर) में हुआ। जाट हमीर जी और रूपादे ने पालन किया। गुरु गोरखनाथ माने जाते हैं; गोरखमालिया (बीकानेर) में तप के बाद ज्ञान मिला। 1504 ईस्वी में कतरियासर में संप्रदाय की नींव पड़ी। मात्र 24 वर्ष की आयु में 1506 ईस्वी में कतरियासर में जीवित समाधि ली। इन्होंने समाज को 36 नियम दिए।

  • अग्नि नृत्य: कतरियासर में जसनाथी सिद्ध दहकते अंगारों पर नंगे पैर नाचते हैं। वे 'फतेह-फतेह' का उद्घोष करते हैं और अंगारों से मतीरा फोड़ते हैं।
  • पवित्र चिन्ह: संप्रदाय में जाल वृक्ष और मोर पंख पूज्य माने जाते हैं। गले में काली ऊन का धागा पहनते हैं। परंपरा कहती है कि सिकंदर लोदी ने कतरियासर को जमीन भेंट की थी। ग्रंथ: 'सिंभूदड़ा' और 'कोंडा'।

रामस्नेही संप्रदाय: चार प्रमुख शाखाएं, रामद्‌वारा और फूलडोल महोत्सव

रामस्नेही संप्रदाय निर्गुण राम भक्ति का प्रमुख पंथ है। यहां राम का अर्थ घट-घट वासी निराकार ईश्वर है। प्रार्थना स्थल 'रामद्‌वारा' कहलाता है, जहां मूर्ति के स्थान पर गुरुवाणी पूजी जाती है। साधु गुलाबी चोला पहनते हैं। इसकी चार मुख्य शाखाएं हैं:

  • 1. शाहपुरा शाखा (प्रधान पीठ): शाहपुरा (भीलवाड़ा जिला; शाहपुरा जिला दिसंबर 2024 में खत्म हुआ) में संत रामचरण जी (1719–1798 ई., जन्म सोडा गांव, टोंक; गुरु कृपाराम) ने बनाई। शाहपुरा में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक प्रसिद्ध 'फूलडोल महोत्सव' भरता है। ग्रंथ: 'अणभैवाणी'।
  • 2. रेण शाखा (मेड़ता, नागौर): संत दरियाव जी ने बनाई। 'रा' से राम और 'म' से मुहम्मद बताकर हिंदू-मुस्लिम एकता सिखाई।
  • 3. सिंहथल शाखा (बीकानेर): संत हरिरामदास जी ने बनाई। प्राणायाम ग्रंथ: 'निशानी'।
  • 4. खेड़ापा शाखा (जोधपुर): संत रामदास जी (जन्म बीकमकोर, जोधपुर; गुरु हरिरामदास जी) ने बनाई। ग्रंथ: 'भक्तमाल'।

मेवात के संत: लालदासजी और चरणदासजी की शिक्षाएं व प्रभाव

मेवात क्षेत्र में दो बड़े संतों ने समाज सुधार की अलख जगाई:

  • संत लालदासजी (1540–1648 ई.): धौलीदूब (अलवर) में मेव परिवार में जन्मे और लालदासी संप्रदाय चलाया। गुरु फकीर गद्दन चिश्ती (तिजारा) थे। ये गृहस्थ संत थे: विवाह हुआ और बेटा-बेटी भी थे। लकड़ी काटकर जीवन चलाते थे और मेहनत की कमाई पर जोर देते थे। आखिरी साल नगला (भरतपुर क्षेत्र) में बीते, वहीं 1648 में देहांत हुआ। बाद में देह शेरपुर (अलवर) लाई गई, जहां इनकी समाधि पर मंदिर बना। धौलीदूब और बांधोली में भी इनके स्थान हैं। हिंदू और मेव मुसलमान, दोनों इन्हें मानते हैं। ग्रंथ: 'लालदास की चेतावणियां'।
  • PYQ: RAS Pre 2024 में संत लालदास पर दो कथनों वाला सवाल आया था: वे आजीवन अविवाहित नहीं थे (गृहस्थ थे), और समाधि स्थल (शेरपुर) पर मंदिर बना।
  • संत चरणदासजी (1703–1782 ई.): जन्म डेहरा गांव (मेवात, अलवर क्षेत्र) में, प्रधान गद्दी दिल्ली में बनी। गुरु शुकदेव थे। संप्रदाय के 42 नियम हैं, साधु पीले वस्त्र पहनते हैं। मान्यता है कि इन्होंने 1739 ईस्वी के नादिरशाह के दिल्ली हमले की भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। शिष्याएं दयाबाई (दयाबोध) और सहजोबाई (सहज प्रकाश) विदुषी रचनाकार थीं।

भक्त शिरोमणि मीराबाई, संत पीपाजी, संत धन्नाजी और संत मावजी

  • मीराबाई (1498–1546 ई.): कुड़की (ब्यावर जिला) में जन्मी मीरा का विवाह 1516 ईस्वी में मेवाड़ के भोजराज से हुआ। पति की मृत्यु के बाद गिरधर गोपाल की कांता भाव (माधुर्य भाव) से अनन्य भक्ति की। परंपरा में इनके गुरु संत रैदास (रविदास) माने जाते हैं, जिनकी छतरी चित्तौड़ दुर्ग में है। मान्यता है कि अंतिम समय में द्वारका के रणछोड़ राय मंदिर में मूर्ति में समा गईं। रचनाएं: 'पदावली', 'गीत गोविंद टीका', 'नरसी जी रो मायरो'।
  • संत पीपाजी: गागरोन (झालावाड़) के खींची चौहान राजा (प्रताप सिंह) थे। स्वामी रामानंद के शिष्य बनकर राजपाट त्यागा। आजीविका के लिए दर्जी का काम अपनाया, इसलिए दर्जी समाज इन्हें पूज्य मानता है। समदड़ी (बालोतरा) में मंदिर, गागरोन दुर्ग में छतरी और टोडा (टोंक) में साधना गुफा है।
  • संत धन्नाजी: धुवन (टोंक) के जाट किसान परिवार में जन्मे। रामानंद के शिष्य बने। हठ से ठाकुर जी को भोजन कराया। राजस्थान में भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक संत हैं। पद गुरु ग्रंथ साहिब में हैं।
  • संत मावजी (जन्म 1714 ई.): साबला (डूंगरपुर) में जन्मे, निष्कलंक संप्रदाय बनाया। इन्हें कल्कि अवतार माना जाता है। सोम, माही, जाखम संगम पर बेणेश्वर धाम बनाया, जहां माघ पूर्णिमा को आदिवासियों का मेला लगता है। भविष्यवाणियों का ग्रंथ 'चोपड़ा' कहलाता है।

Table 1: राजस्थान के प्रमुख संत, संप्रदाय, मुख्य पीठ और नियम

संत का नाम संप्रदाय प्रधान पीठ नियम / पहचान प्रमुख ग्रंथ
दादू दयाल दादू पंथ नरेना (जयपुर) अलख दरीबा, 52 थांभ, शव जंगल में छोड़ने की प्रथा दादू वाणी
संत जाम्भोजी विश्नोई संप्रदाय मुक्तिधाम मुकाम (नोखा) 29 नियम, पर्यावरण व वन्य जीव रक्षा जंभसागर
संत जसनाथजी जसनाथी संप्रदाय कतरियासर (बीकानेर) 36 नियम, अंगारों पर अग्नि नृत्य सिंभूदड़ा
संत रामचरणजी रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा (भीलवाड़ा) निर्गुण राम नाम, रामद्‌वारा, फूलडोल अणभैवाणी
संत लालदासजी लालदासी संप्रदाय शेरपुर (अलवर) समाधि मंदिर; नगला (भरतपुर) गृहस्थ संत, मेहनत की कमाई, हिंदू-मेव दोनों के पूज्य चेतावणियां
संत चरणदासजी चरणदासी संप्रदाय दिल्ली (जन्म: अलवर) 42 नियम, पीले वस्त्र भक्ति सागर
मीराबाई सगुण कृष्ण भक्ति चित्तौड़गढ़, द्वारका माधुर्य भाव, गुरु रैदास, प्रेम निष्ठा पदावली
संत पीपाजी निर्गुण भक्ति समदड़ी (बालोतरा) दर्जी समाज के पूज्य, स्वावलंबन पीपा जी री परची
संत मावजी निष्कलंक संप्रदाय बेणेश्वर (डूंगरपुर) कल्कि अवतार, बेणेश्वर धाम, भविष्यवाणी चोपड़ा
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Table 2: रामस्नेही संप्रदाय की चार शाखाएं, संस्थापक और केंद्र

शाखा प्रवर्तक संत गुरु मुख्य केंद्र खास बात व ग्रंथ
शाहपुरा (प्रधान पीठ) संत रामचरण जी कृपाराम जी शाहपुरा (भीलवाड़ा) फूलडोल मेला, अणभैवाणी
रेण शाखा संत दरियाव जी प्रेमदास जी रेण (मेड़ता, नागौर) रा-म दर्शन (एकता)
सिंहथल शाखा संत हरिरामदास जी जयमलदास जी सिंहथल (बीकानेर) योग ग्रंथ: निशानी
खेड़ापा शाखा संत रामदास जी हरिरामदास जी खेड़ापा (जोधपुर) ग्रंथ: भक्तमाल

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision)

  • दादू दयाल राजस्थान के कबीर हैं; मुख्य गद्दी नरेना में और सत्संग स्थल अलख दरीबा है।
  • दादू जी के 52 शिष्य 52 थांभ कहलाए; रज्जब जी आजीवन दूल्हे रहे, सुंदरदास जी ने नागा शाखा बनाई।
  • संत जाम्भोजी ने 1485 में समराथल धोरा पर 29 नियमों से विश्नोई पंथ शुरू किया; 1536 में लालासर में निर्वाण, समाधि मुकाम (बीकानेर) में है।
  • संत लालदासजी (मेव, धौलीदूब-अलवर) गृहस्थ संत थे; समाधि मंदिर शेरपुर (अलवर) में है।
  • 1730 में खेजड़ली में अमृता देवी विश्नोई संग 363 लोगों ने पेड़ों के लिए प्राण दिए।
  • संत जसनाथजी ने 36 नियम दिए; कतरियासर में सिद्ध जन 'फतेह-फतेह' बोलते हुए अग्नि नृत्य करते हैं।
  • रामस्नेही संप्रदाय की 4 शाखाएं हैं: शाहपुरा (रामचरण जी), रेण (दरियाव जी), सिंहथल (हरिरामदास जी), खेड़ापा (रामदास जी)।
  • संत चरणदास जी (डेहरा, मेवात) की मुख्य गद्दी दिल्ली में है; 42 नियम दिए, साधु पीले वस्त्र पहनते हैं।
  • संत पीपाजी गागरोन के राजा थे; दर्जी समाज के पूज्य हैं और मुख्य मंदिर समदड़ी (बालोतरा) में है।
  • मीराबाई का जन्म कुड़की (ब्यावर) में हुआ; भक्ति माधुर्य (कांता) भाव की थी।
  • संत मावजी ने निष्कलंक संप्रदाय और बेणेश्वर धाम बनाया; भविष्यवाणियों के ग्रंथ चोपड़ा कहलाते हैं।

RAS Prelims MCQ

  1. 'राजस्थान का कबीर' कहे जाने वाले संत दादू दयाल की मुख्य गद्दी कहाँ है?
    A) कतरियासर
    B) नरेना
    C) समदड़ी
    D) शाहपुरा
    उत्तर: B) नरेना
    कारण: दादू पंथ की प्रधान पीठ नरेना में है।
  2. 1585 ईस्वी में फतेहपुर सीकरी में अकबर से मिलने वाले संत कौन थे?
    A) सुंदरदास जी
    B) रामचरण जी
    C) दादू दयाल
    D) रज्जब जी
    उत्तर: C) दादू दयाल
    कारण: भगवंत दास के सहयोग से 1585 में दादू दयाल अकबर से मिले थे।
  3. आजीवन दूल्हे के वेश में रहकर दादू वाणी का प्रचार करने वाले संत कौन थे?
    A) सुंदरदास जी
    B) रज्जब जी
    C) बालिंद जी
    D) जनगोपाल जी
    उत्तर: B) रज्जब जी
    कारण: सांगानेर के संत रज्जब जी जीवन भर दूल्हे के वेश में रहे।
  4. संत जाम्भोजी ने विश्नोई संप्रदाय की स्थापना किस स्थान पर की?
    A) पीपासर
    B) समराथल धोरा
    C) मुकाम
    D) लालासर
    उत्तर: B) समराथल धोरा
    कारण: 1485 में समराथल धोरा पर 29 नियमों से विश्नोई पंथ शुरू हुआ।
  5. 'अग्नि नृत्य' किस संप्रदाय के सिद्ध जनों से 'फतेह-फतेह' बोलते हुए किया जाता है?
    A) दादू पंथ
    B) रामस्नेही संप्रदाय
    C) जसनाथी संप्रदाय
    D) विश्नोई संप्रदाय
    उत्तर: C) जसनाथी संप्रदाय
    कारण: जसनाथी सिद्ध कतरियासर में अंगारों पर अग्नि नृत्य करते हैं।
  6. रामस्नेही संप्रदाय की 'सिंहथल शाखा' के प्रवर्तक कौन थे?
    A) दरियाव जी
    B) हरिरामदास जी
    C) रामदास जी
    D) रामचरण जी
    उत्तर: B) हरिरामदास जी
    कारण: सिंहथल शाखा के संस्थापक संत हरिरामदास जी थे और ग्रंथ 'निशानी' है।
  7. शाहपुरा में रामस्नेही संप्रदाय का प्रसिद्ध 'फूलडोल महोत्सव' कब भरता है?
    A) फाल्गुन पूर्णिमा
    B) चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी
    C) भाद्रपद शुक्ल दशमी
    D) आश्विन कृष्ण एकादशी
    उत्तर: B) चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी
    कारण: शाहपुरा में चैत्र कृष्ण एकम से पंचमी तक फूलडोल मेला लगता है।
  8. मेव परिवार में जन्मे किस गृहस्थ संत की समाधि पर शेरपुर (अलवर) में मंदिर बना है?
    A) चरणदास जी
    B) लालदास जी
    C) दादू दयाल
    D) धन्ना जी
    उत्तर: B) लालदास जी
    कारण: धौलीदूब (अलवर) के संत लालदास गृहस्थ थे; उनकी समाधि शेरपुर (अलवर) में है, जहां मंदिर बना।
  9. दर्जी समुदाय किस लोक संत को अपना आराध्य मानता है?
    A) धन्ना जी
    B) पीपा जी
    C) रैदास जी
    D) रज्जब जी
    उत्तर: B) पीपा जी
    कारण: गागरोन के राजा पीपा जी ने संन्यास लेकर दर्जी का काम अपनाया था।
  10. वागड़ में निष्कलंक संप्रदाय और बेणेश्वर धाम बनाने वाले संत कौन थे?
    A) मावजी
    B) दुर्लभ जी
    C) हरिदास जी
    D) लालदास जी
    उत्तर: A) मावजी
    कारण: संत मावजी ने निष्कलंक संप्रदाय बनाया, ग्रंथ चोपड़ा कहलाते हैं।

RAS Mains Questions

Exam के लिए Important Questions नीचे दिए गए हैं:

Short Questions (2–3 marks)

  1. दादू पंथ के 'अलख दरीबा' और '52 थांभ' से क्या आशय है?
    उत्तर रूपरेखा: दादू पंथ के सत्संग स्थल को अलख दरीबा कहते हैं। दादू जी के 52 प्रमुख शिष्य जिन्होंने गद्दियां बनाईं, 52 थांभ कहलाए।
  2. संत जाम्भोजी के पर्यावरण दर्शन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
    उत्तर रूपरेखा: जाम्भोजी ने 29 नियमों में हरे पेड़ न काटने और जीव रक्षा सिखाई। इसी सीख पर 1730 में अमृता देवी और 363 विश्नोइयों ने खेजड़ली में प्राण दिए।
  3. जसनाथी संप्रदाय के अग्नि नृत्य की मुख्य बातें बताइए।
    उत्तर रूपरेखा: कतरियासर में जसनाथी सिद्ध दहकते अंगारों पर नंगे पैर नाचते हैं। 'फतेह-फतेह' बोलते हुए मतीरा फोड़ने जैसे करतब दिखाते हैं।
  4. रामस्नेही संप्रदाय की चारों शाखाओं और प्रवर्तकों के नाम लिखिए।
    उत्तर रूपरेखा: 1. शाहपुरा - संत रामचरण जी। 2. रेण - संत दरियाव जी। 3. सिंहथल - संत हरिरामदास जी। 4. खेड़ापा - संत रामदास जी।
  5. संत पीपा जी से जुड़े तीन प्रमुख ऐतिहासिक स्थल कौन से हैं?
    उत्तर रूपरेखा: 1. मंदिर - समदड़ी (बालोतरा)। 2. छतरी - गागरोन दुर्ग (झालावाड़)। 3. साधना गुफा - टोडा रायसिंह (टोंक)।

Long Questions (5–10 marks)

  1. मध्यकालीन राजस्थान में दादू दयाल और दादू पंथ के सामाजिक योगदान का मूल्यांकन कीजिए। (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - परिचय: दादू दयाल 'राजस्थान का कबीर' कहलाए। नरेना में मुख्य पीठ बनाकर निर्गुण भक्ति का मार्ग दिखाया।
    - सुधार: जाति भेद और आडंबर का खंडन, अलख दरीबा में सर्वसुलभ सत्संग, शव खुले जंगल में छोड़ना।
    - सद्भाव व साहित्य: अकबर से भेंट, रज्जब जी जैसे शिष्य, ढूंढाड़ी में दादू वाणी रचना।
    - शाखाएं: खालसा, नागा, विरक्त, उत्तरादे व खाकी शाखाओं से समाज को संगठित किया।
  2. राजस्थान के धार्मिक संप्रदायों ने पर्यावरण और सामाजिक समरसता के लिए क्या कार्य किए? (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - विश्नोई संप्रदाय: जाम्भोजी के 29 नियम, जीव रक्षा, 1730 का खेजड़ली बलिदान (अमृता देवी)।
    - जसनाथी संप्रदाय: जाल वृक्ष व मोर पंख की पवित्रता, सात्विक जीवन के 36 नियम।
    - मेवात के संत: लालदासजी (हिंदू और मेव दोनों के पूज्य) व चरणदासजी ने सद्भाव और मेहनत की कमाई सिखाई।
    - रामस्नेही पंथ: निर्गुण राम नाम से सभी जातियों को जोड़ा, दरियाव जी का 'रा-म' समन्वय।
    - सार संक्षेप: मरुभूमि में इन संप्रदायों ने प्रकृति संतुलन और मानवीय प्रेम की गहरी नींव रखी।

FAQs

दादू पंथ में अंतिम संस्कार कैसे होता है?

दादू पंथ में शव को न जलाते हैं, न गाड़ते हैं, बल्कि जंगल में खुले स्थान पर छोड़ देते हैं ताकि जीव-जंतुओं की भूख मिट सके।

संत जाम्भोजी के विश्नोई पंथ में कितने नियम हैं और मुख्य ग्रंथ कौन से हैं?

विश्नोई पंथ में 29 नियम हैं। मुख्य ग्रंथ 'जंभसागर', 'जंभसंहिता' और '120 शब्दवाणी' हैं।

फूलडोल महोत्सव कहाँ और कब भरता है?

यह महोत्सव रामस्नेही संप्रदाय की प्रधान पीठ शाहपुरा (भीलवाड़ा) में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक भरता है।

संत चरणदास जी की प्रमुख शिष्याएं कौन थीं और उनकी किताबें क्या हैं?

इनकी शिष्याएं दयाबाई (दयाबोध, विनय मालिका) और सहजोबाई (सहज प्रकाश, सोलह तिथि) थीं।

परीक्षा के लिए याद रखें

  • दादू पंथ: प्रधान पीठ नरेना (जयपुर), सत्संग स्थल अलख दरीबा, 52 थांभ।
  • विश्नोई: जाम्भोजी, समराथल धोरा 1485, 29 नियम, समाधि मुकाम (बीकानेर)।
  • जसनाथी: कतरियासर (बीकानेर), 36 नियम, अग्नि नृत्य, गुरु गोरखनाथ।
  • रामस्नेही: शाहपुरा (भीलवाड़ा) प्रधान पीठ, रामचरण जी, फूलडोल मेला।
  • लालदासी: संत लालदास (मेव, धौलीदूब-अलवर), गृहस्थ संत, समाधि मंदिर शेरपुर (अलवर) - RAS Pre 2024।
  • चरणदासी: गद्दी दिल्ली, 42 नियम, पीले वस्त्र; शिष्याएं दयाबाई और सहजोबाई।
  • निष्कलंक: संत मावजी (साबला, डूंगरपुर), बेणेश्वर धाम, ग्रंथ चोपड़ा।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Quick Answer: Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत।
राजस्थान का इतिहास और संस्कृति के पाठ्यक्रम में Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय: दादू, जसनाथी, विश्नोई, रामस्नेही और मीरा एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मुख्य सिद्धांतों, परीक्षा प्रश्नों और सूत्रों को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
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In this Chapter

Rajasthan ke Sant aur Sampraday: राजस्थान के संत और संप्रदाय: दादू, जसनाथी, विश्नोई, रामस्नेही और मीरा
साहित्यिक राजस्थान: भाषा, प्रमुख बोलियाँ और साहित्यकार