RAS (आरपीएससी) 9 min read

राजस्थान की लोक कलाएँ

लोक नृत्य

राजस्थान के लोक नृत्य यहाँ की संस्कृति, उमंग और परंपराओं का प्रतीक हैं।

प्रमुख क्षेत्रीय एवं जातीय नृत्य

नृत्यक्षेत्र/जातिमुख्य विशेषताएँ
अग्नि नृत्यबीकानेर (जसनाथी संप्रदाय)धधकते अंगारों (धूणा) पर किया जाता है। नर्तक 'मतीरा फोड़ना' और हल जोतने जैसी क्रियाएं करते हैं।
घूमरराज्य नृत्यमांगलिक अवसरों पर महिलाओं द्वारा किया जाता है। लहंगे के घेर को 'घूम' कहते हैं।
कच्छी घोड़ीशेखावाटीपुरुषों द्वारा नकली घोड़ों पर किया जाता है। लहंगे के फूल के खिलने और मुरझाने का आभास होता है।
तेरह तालीकामड़ जाति (रामदेवरा)महिलाएं शरीर पर 13 मंजीरे बांधकर बैठकर नृत्य करती हैं। वाद्य: तानपुरा, चौतारा।
कालबेलियाकालबेलिया जातिप्रमुख नृत्य: इंडाणी, पणिहारी, शंकरिया (युगल)। प्रसिद्ध नृत्यांगना: गुलाबो
चरीकिशनगढ़ (गुर्जर)सिर पर जलते हुए कपास के बीजों (काकड़ा) वाली चरी रखकर नृत्य। वाद्य: बांकिया, ढोल।
गवरी (राई)मेवाड़ (भील)सबसे प्राचीन लोकनाट्य। शिव (बुढ़िया) और भस्मासुर की कथा पर आधारित। सावन-भादों में 40 दिन तक चलता है।
घुड़लाजोधपुरछिद्रित मटके में जलता दीपक रखकर महिलाओं द्वारा। रूपायन संस्थान (कमल कोठारी) ने संरक्षण दिया।
बम नृत्यभरतपुर/अलवरनई फसल पर पुरुषों द्वारा बड़े नगाड़े (बम) के साथ। गीत: बम रसिया।
वालरसिरोही (गरासिया)बिना किसी वाद्य यंत्र के धीमी गति से किया जाने वाला युगल नृत्य।
भवाईउदयपुरचमत्कारिक नृत्य। सिर पर 7-8 मटके रखना, जमीन से मुंह से रुमाल उठाना।

लोक नाट्य

  • ख्याल:
    • कुचामणी: प्रवर्तक लच्छीराम। खुले मंच पर, ऊँचे स्वर में गायन।
    • जयपुरी: लचीली शैली, महिलाएं भी अभिनय करती हैं।
    • तुरा कलंगी: मेवाड़। शिव (तुरा) और शक्ति (कलंगी) के संवाद। शाह अली और तुकनगीर ने रचना की।
    • शेखावाटी: नानूराम और दुलिया राणा प्रसिद्ध कलाकार।
  • रम्मत: बीकानेर और जैसलमेर। पाटा (लकड़ी के तख्त) पर मंचन। जैसलमेर के तेज कवि ने "स्वतंत्र भावनी" रचकर गांधीजी को भेंट की।
  • फड़: कपड़े पर लोकदेवताओं की गाथा का चित्रण। केंद्र: शाहपुरा (भीलवाड़ा) (जोशी परिवार)। भोपों द्वारा वाचन (पाबूजी - रावणहत्था, देवनारायणजी - जंतर)।
  • स्वांग: बहरूपिया कला। प्रसिद्ध कलाकार: जानकीलाल भांड (भीलवाड़ा)।
  • नौटंकी: भरतपुर, धौलपुर में लोकप्रिय (हाथरस शैली)।

लोक वाद्य यंत्र

श्रेणीविवरणप्रमुख वाद्य
सुषिर (फूँक वाले)हवा से स्वर उत्पत्ति।अलगोजा: राज्य वाद्य यंत्र (दो बांसुरी)। रामनाथ चौधरी नाक से बजाते हैं।
शहनाई: सर्वश्रेष्ठ सुषिर वाद्य (मांगी बाई)।
बांकिया: चरी नृत्य में प्रयुक्त।
तत् (तार वाले)तारों से स्वर उत्पत्ति।रावणहत्था: सबसे प्राचीन, पाबूजी की फड़ में।
सारंगी: सर्वश्रेष्ठ तत् वाद्य (लंगा जाति)।
कामायचा: 27 तार, मांगणियार जाति।
जंतर: वीणा जैसा, देवनारायण जी की फड़ में।
अवनद्ध (चमड़े वाले)चमड़े से मढ़े हुए।चंग: होली पर शेखावाटी में।
मादल: मिट्टी से निर्मित (भील)।
भपंग: डमरू जैसा, जहूर खां मेवाती (अलवर)।
घन (धातु/काष्ठ)चोट मारने से स्वर।खड़ताल: सद्दीक खां प्रसिद्ध वादक।
मंजीरा: तेरह ताली में प्रयोग।

हस्तशिल्प

  • थेवा कला: प्रतापगढ़ (कांच पर सोने का सूक्ष्म चित्रांकन)।
  • ब्लू पॉटरी: जयपुर (रामसिंह द्वितीय के समय विकास, कृपाल सिंह शेखावत ने पहचान दिलाई)।
  • उस्ता कला: बीकानेर (ऊंट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी)। हिसामुद्दीन उस्ता।
  • टेराकोटा: मोलेला (राजसमन्द) - मिट्टी की मूर्तियां। हरजी (जालोर) - मामाजी के घोड़े।
  • वस्त्र उद्योग:
    • कोटा डोरिया (मसूरिया): कैथून (कोटा)।
    • बादला: जस्ते से निर्मित पानी की बोतलें (जोधपुर)।
    • दाबू प्रिंट: आकोला (चित्तौड़)।
    • बंधेज: जयपुर/जोधपुर (टाई एंड डाई)।

In this Chapter

राजस्थान की लोक कलाएँ
No other notes in this chapter.