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राजस्थान की कला एवं संस्कृति

अध्याय सारांश

राजस्थान अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, जिसमें साहित्य, स्थापत्य, चित्रकला और मेले शामिल हैं। यहाँ की संस्कृति राजपूत और मुगल परंपराओं का मिश्रण है, जिसे "सांझी संस्कृति" कहा जाता है।

साहित्य

  • संस्कृत: जयानक कृत पृथ्वीराज विजय और विग्रहराज चतुर्थ कृत हरिकेली नाटक। राणा कुंभा ने संगीत राज जैसे ग्रंथ लिखे।
  • राजस्थानी: जैन, चारण, संत और लोक शैलियों में विभाजित।
    • चंदबरदाई: पृथ्वीराज रासो की रचना की।
    • सूर्यमल मिश्रण: बूंदी के राज्य कवि, वंश भास्कर और वीर सतसई लिखी।
    • पृथ्वीराज राठौड़: वेलि क्रिसन रुक्मणी री (बीकानेर) की रचना की।
    • मुहणोत नैणसी: नैणसी री ख्यात लिखी।

स्थापत्य कला

प्रकारप्रमुख उदाहरण
दुर्गचित्तौड़गढ़: सबसे बड़ा लिविग फोर्ट, विजय स्तंभ।
कुम्भलगढ़: विशाल दीवारें, बादल महल।
गागरोन: जल दुर्ग (झालावाड़)।
जैसलमेर: सोनार किला (पीले पत्थर)।
रणथंभौर व तारागढ़: गिरी दुर्ग।
मंदिरदेुलवाड़ा (माउंट आबू): संगमरमर के जैन मंदिर (विमल वसही, लूण वसही)।
रणकपुर: 1444 खंभों वाला जैन मंदिर।
किराडू: राजस्थान का खजुराहो।
हवेलियाँजैसलमेर: पटवों की हवेली, सालिम सिंह की हवेली।
शेखावाटी: भित्ति चित्रों (फ्रेस्को) के लिए प्रसिद्ध।
छतरियाँजसवंत थड़ा (जोधपुर), गेटोर (जयपुर), आहड़ (उदयपुर)

चित्रकला शैलियाँ

  • मेवाड़ शैली: सबसे प्राचीन। लाल-पीले रंग। चित्रकार: साहिबदीन, मनोहर।
  • किशनगढ़ शैली: बनी-ठणी (भारत की मोनालिसा) के लिए प्रसिद्ध। चित्रकार: निहालचंद। संरक्षक: नागरीदास।
  • बूंदी शैली: पशु-पक्षियों का चित्रण।
  • कोटा शैली: शिकार के दृश्यों का चित्रण।
  • जयपुर शैली: सर्वाधिक मुगल प्रभाव।

लोक कला और उत्सव

  • मेले: पुष्कर (अजमेर), उर्स (अजमेर), रामदेवरा (रुणीचा), तेजाजी (परबतसर)।
  • त्योहार: गणगौर (ईसर-गौरी की पूजा) और तीज (जयपुर की प्रसिद्ध)।
  • लोक नाट्य: गवरी (भील जनजाति), रम्मत (बीकानेर/जैसलमेर), ख्याल (कुचामणी/शेखावाटी)।
  • लोक नृत्य: घूमर (राज्य नृत्य), कालबेलिया (सपेरा जाति), गैर (होली), तेरहताली (रामदेवरा मेला)।
  • फड़: कपड़े पर लोकदेवता की गाथा का चित्रण (जैसे पाबूजी की फड़)। केंद्र: शाहपुरा।

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