RAS (आरपीएससी) 5 min read

राजस्थान में सूखा और अकाल: मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ

RK

लेखक Ratan Kumawat · संस्थापक, NotesMedia

प्रकाशित:

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: राजस्थान का भूगोल (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: राजस्थान में सूखा और अकाल: मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ - पर्यावरणीय चुनौतियाँ (सूखा, मरुस्थलीकरण)
  • • अवलोकन: Quick Answer: राजस्थान का 61.11% भूभाग थार मरुस्थल में आता है, जहाँ लगभग 40% आबादी रहती है। इसरो (SAC-ISRO) के Desertification Atlas 2021 (आंकड़े 2018-1...
Quick Answer: राजस्थान का 61.11% भूभाग थार मरुस्थल में आता है, जहाँ लगभग 40% आबादी रहती है। इसरो (SAC-ISRO) के Desertification Atlas 2021 (आंकड़े 2018-19) के अनुसार राज्य की लगभग 21.23 मिलियन हेक्टेयर यानी लगभग 62% भूमि मरुस्थलीकरण और क्षरण से प्रभावित है, जिसमें वायु अपरदन सबसे बड़ा कारण है। अकाल के संदर्भ में मारवाड़ की लोक उक्ति "तीजो कूरियो, आठवो काल" प्रसिद्ध है, और लोक परंपरा में संकट को अन्नकाल, जलकाल, तृणकाल और त्रिकाल में बांटा गया है। विक्रम संवत 1956 (1899-1900 ई.) का 'छप्पनिया अकाल' सबसे भीषण था। मरुस्थलीकरण रोकने के लिए जोधपुर में काजरी (CAZRI 1959) और आफरी (AFRI 1988) कार्यरत हैं, DPAP (1973-74) और DDP (1977-78) जैसे कार्यक्रम 2009-10 में IWMP (अब PMKSY का वाटरशेड घटक) में मिला दिए गए, जबकि अरावली ग्रीन वॉल (2023) नई पहल है।
Advertisement

राजस्थान में मरुस्थलीकरण की स्थिति और मुख्य कारक

राजस्थान का कुल क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है। इसका 61.11% हिस्सा थार मरुस्थल में आता है, जहाँ 40% आबादी और भारी पशुधन बसता है। राज्य के प्राकृतिक संसाधनों, वनों और मिट्टियों की जानकारी पढ़ें: Natural Resources: Forests, Soils and Minerals।

इसरो के Desertification Atlas 2021 (आंकड़े 2018-19) के अनुसार राजस्थान की लगभग 21.23 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 62%) जमीन मरुस्थलीकरण और क्षरण की चपेट में है। देश में क्षरण प्रभावित कुल क्षेत्रफल में राजस्थान शीर्ष पर है। पुराने 33 जिलों के आधार पर 12 पश्चिमी जिले (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, नागौर, चूरू, सीकर, झुंझुनूं, जालोर, पाली, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़) मरुस्थलीय प्रदेश में गिने जाते हैं; 2023 में इन्हीं से बने फलोदी, बालोतरा और डीडवाना-कुचामन जिले भी इसी क्षेत्र में हैं।

मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारक

  • वायु अपरदन (Wind Erosion): शुष्क हवाएं रेत के टीलों को आगे बढ़ाती हैं। राज्य में भूमि क्षरण की सबसे बड़ा कारण वायु अपरदन ही है। उपजाऊ ऊपरी मिट्टी उड़ने से खेत बंजर होते हैं।
  • अत्यधिक पशुचारण और वन कटाव: भारी पशुधन से चरागाह घटते हैं। खेजड़ी (Prosopis cineraria) और रोहिड़ा की कटाई से वनस्पति आवरण कम हुआ है।
  • जल अपरदन (Water Erosion): अरावली की ढलानों और चंबल बेसिन में वर्षा बहाव से उपजाऊ मिट्टी बह जाती है।
  • नहरी क्षेत्रों में सेम की समस्या: इंदिरा गांधी नहर (IGNP) क्षेत्र में जल निकासी की कमी से जलस्तर ऊपर आ गया है। इस जलभराव को 'सेम' कहते हैं। केशिका क्रिया से भूमि पर लवण जमने से खेत बंजर हो जाते हैं।
  • भूजल का भारी दोहन: नलकूपों के भारी उपयोग से पश्चिमी और मध्य राजस्थान के कई ब्लॉक डार्क जोन बन चुके हैं।

सूखा और अकाल: पारंपरिक वर्गीकरण, लोक कहावतें व इतिहास

अरावली पर्वतमाला की दिशा दक्षिण-पश्चिम मानसून की अरब सागर शाखा के समानांतर होने से हवाएं बिना बरसे निकल जाती हैं। बंगाल की खाड़ी की शाखा यहाँ तक आते-आते शुष्क हो जाती है। राज्य के पारंपरिक जल संचयन को जानने के लिए पढ़ें: Water Conservation: Need of the Day।

लोक कहावतें और अकाल का अनुभव

मारवाड़ में सूखे की बारंबारता पर प्रसिद्ध कहावत है: "तीजो कूरियो, आठवो काल"। इसका अर्थ है कि हर तीसरे साल कूरियो (आंशिक कमी) और हर आठवें साल भीषण अकाल पड़ता है।

अकाल के प्रसार पर प्राचीन दोहा लोकप्रिय है:
"पग पूंगल धड़ कोटड़े, बांह बाड़मेर।
जाय लाधे जोधपुर, ठावो जैसलमेर।।"

भावार्थ: अकाल के पैर पूंगल में, धड़ कोटड़ा में, भुजाएं बाड़मेर में और कभी-कभार जोधपुर में डेरा रहता है, जबकि इसका स्थाई ठिकाना जैसलमेर है।

अकाल का लोक वर्गीकरण

  • अन्नकाल: वर्षा की कमी से फसलें सूखने पर अनाज की भारी किल्लत।
  • जलकाल: कुएं, बावड़ियां और तालाब सूखने से इंसानों और मवेशियों के लिए पेयजल का अभाव।
  • तृणकाल: चरागाह सूखने से चारे का अभाव।
  • त्रिकाल: जब अन्न, जल और तृण तीनों का एक साथ अभाव हो जाए।

छप्पनिया अकाल (Vikram Samvat 1956)

विक्रम संवत 1956 (ईस्वी सन् 1899-1900) का अकाल 'छप्पनिया अकाल' कहलाता है। यह भयंकर त्रिकाल था, जिसमें बारिश पूरी तरह विफल रही। भोजन और पानी की कमी से भारी जनहानि और पशुहानि हुई। लोग खेजड़ी के तनों की छाल पीसकर खाने पर विवश हुए। इस अकाल के बाद 1901 में अकाल आयोग (MacDonnell Commission) ने राहत व्यवस्था की समीक्षा की।

Table 1: राजस्थान में अकाल के प्रकार, लोक मान्यताएं और ऐतिहासिक प्रभाव

संकट का प्रकार / संदर्भ अर्थ और मुख्य लक्षण प्रभावित क्षेत्र व स्वरूप RPSC परीक्षा के मुख्य बिंदु
अन्नकाल फसल नष्ट होने से अनाज की भारी कमी कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण परिवार कम मानसूनी वर्षा का पहला प्रत्यक्ष असर
जलकाल पेयजल स्रोतों और तालाबों का सूखना ग्रामीण बस्तियां और पशुधन पारंपरिक जल स्रोतों (टांका, बावड़ी) की महत्ता
तृणकाल पशु चारे और घासों (सेवण, धामण) का अभाव पशुपालक वर्ग का अन्य राज्यों में पलायन पशुधन आधारित ग्रामीण आजीविका पर संकट
त्रिकाल अन्न, जल और चारा तीनों का एक साथ संकट समस्त जनजीवन और वन्यजीव वि.सं. 1956 के छप्पनिया अकाल का स्वरूप
तीजो कूरियो, आठवो काल मारवाड़ की प्रसिद्ध लोक उक्ति पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थली जिले हर तीसरे साल अर्ध-अकाल व आठवें साल पूर्ण अकाल
छप्पनिया अकाल वि.सं. 1956 (1899-1900 ई.) का महा-अकाल पूरा राजस्थान और पड़ोसी भूभाग राजस्थान के इतिहास का सबसे भीषण अकाल माना जाता है

संस्थान और नीतियां: काजरी, आफरी व प्रमुख योजनाएं

मरुस्थल के विस्तार को रोकने, टीलों को स्थिर करने और शुष्क क्षेत्रों में आजीविका सुरक्षा के लिए प्रमुख संस्थानों और विकास कार्यक्रमों की स्थापना की गई।

1. केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI - काजरी), जोधपुर

काजरी की शुरुआत 1952 में 'मरु वनीकरण केंद्र' के रूप में हुई। 1957 में पुनर्गठन हुआ और 1959 में यूनेस्को के सहयोग से काजरी की पूर्ण स्थापना हुई। 1966 में इसे ICAR के अधीन लाया गया।

काजरी के मुख्य अनुसंधान कार्य:

  • रेत के टीलों का स्थिरीकरण: कंटीली झाड़ियों और वायु अवरोधक पट्टियों (shelterbelts) से उड़ती रेत को बांधना।
  • चारागाह विकास: सेवण (Lasiurus scindicus) और धामण (Cenchrus ciliaris) घासों का प्रसार।
  • शुष्क बागवानी: कम पानी में उगने वाले बेर, अनार, केर, सांगरी और गोंदा का विकास।
  • कृषि-सौर ऊर्जा तालमेल: शुष्क भूमि में सौर तकनीकों का कृषि के साथ समन्वय।

2. शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI - आफरी), जोधपुर

आफरी की स्थापना 1988 में केंद्रीय पर्यावरण व वन मंत्रालय (अब MoEFCC) के अधीन ICFRE के संस्थान के रूप में जोधपुर में हुई। यह संस्थान शुष्क वानिकी, जैव-विविधता संरक्षण और लवणीय भूमि सुधार पर शोध करता है।

3. प्रमुख योजनाएं और कार्यक्रम

  • सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP): केंद्र ने 1973-74 में शुरू किया (राजस्थान की पुस्तकों में 1974-75 भी मिलता है)। बाद के वाटरशेड नियमों में केंद्र:राज्य हिस्सा 75:25 रहा। लक्ष्य भूमि व जल का समेकित विकास था। 2009-10 में इसे IWMP में मिला दिया गया।
  • मरु विकास कार्यक्रम (DDP): 1977-78 में शुरू इस कार्यक्रम का उद्देश्य मरुस्थलीकरण की रोकथाम और हरियाली बढ़ाना था। DPAP की तरह यह भी 2009-10 में IWMP (अब PMKSY-वाटरशेड विकास घटक) में मिला दिया गया।
  • अरावली ग्रीन वॉल परियोजना: मार्च 2023 में शुरू यह योजना गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में अरावली के चारों ओर 1,400 किमी लंबी व 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी विकसित कर रही है।
  • UNCCD COP14 और LDN लक्ष्य: सितंबर 2019 में नई दिल्ली सम्मेलन में भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि बहाली का संकल्प लिया।

Table 2: मरुस्थलीकरण और सूखा नियंत्रण से जुड़े संस्थान, कार्यक्रम व योजनाएं

संस्थान / योजना का नाम शुरुआत का वर्ष मुख्यालय / वित्तीय अनुपात मुख्य उद्देश्य और कार्य
काजरी (CAZRI) 1959 (मूल 1952) जोधपुर (ICAR के अधीन) रेत के टीलों का स्थिरीकरण, शुष्क कृषि और सेवण घास पर शोध
आफरी (AFRI) 1988 जोधपुर (ICFRE के अधीन) शुष्क वानिकी, लवणीय भूमि सुधार और वन संवर्धन पर कार्य
सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP) 1973-74 2009-10 में IWMP में विलय सूखा क्षेत्रों में जल, मृदा और वनस्पति का समेकित विकास
मरु विकास कार्यक्रम (DDP) 1977-78 2009-10 में IWMP में विलय मरुस्थल के विस्तार की रोकथाम और पारिस्थितिक संतुलन
अरावली ग्रीन वॉल परियोजना 2023 MoEFCC (4 राज्य / UT) 1,400 किमी लंबी व 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी से रेत रोकना
UNCCD COP14 लक्ष्य 2019 अंतरराष्ट्रीय संकल्प 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि की बहाली

जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकीय संकट के नए आयाम

वैश्विक तापमान वृद्धि और मानसूनी चक्र के बदलाव ने राज्य के संवेदनशील मरु पारिस्थितिकी तंत्र को और नाजुक बना दिया है:

  • अचानक बाढ़ (Flash Floods): पश्चिमी राजस्थान के कम वर्षा वाले जिलों (बाड़मेर, जालोर) में अचानक तेज बारिश से भारी कटाव होता है।
  • तीव्र ग्रीष्म लहर: फलोदी और चूरू में तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने से वाष्पीकरण बढ़ जाता है।
  • गोडावण पर संकट: मरु राष्ट्रीय उद्यान का राज्य पक्षी गोडावण घास के मैदानों के सिकुड़ने और बिजली तारों से संकटग्रस्त है।

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Notes)

  • राजस्थान का 61.11% भूभाग थार मरुस्थल में है, जहाँ लगभग 40% आबादी रहती है।
  • इसरो के Atlas 2021 (2018-19 आंकड़े) के अनुसार राज्य की लगभग 62% (21.23 मिलियन हेक्टेयर) भूमि मरुस्थलीकरण व क्षरण से प्रभावित है।
  • राजस्थान में भूमि क्षरण की सबसे बड़ा कारण वायु अपरदन है।
  • पुराने 33 जिलों के आधार पर 12 पश्चिमी जिले मरुस्थलीय प्रदेश में गिने जाते हैं।
  • मारवाड़ की लोक उक्ति "तीजो कूरियो, आठवो काल" सूखे की नियमित बारंबारता दर्शाती है।
  • अकाल के चार पारंपरिक रूप हैं: अन्नकाल, जलकाल, तृणकाल और त्रिकाल।
  • वि.सं. 1956 (1899-1900 ई.) का 'छप्पनिया अकाल' राजस्थान का सबसे भयानक त्रिकाल था।
  • काजरी (CAZRI) की स्थापना 1959 में जोधपुर में हुई; 1966 में यह ICAR के अधीन आया।
  • आफरी (AFRI) की स्थापना 1988 में ICFRE के अधीन जोधपुर में हुई।
  • DPAP 1973-74 और DDP 1977-78 में शुरू हुए; दोनों 2009-10 में IWMP में मिला दिए गए।
  • मार्च 2023 में 1,400 किमी लंबी और 5 किमी चौड़ी 'अरावली ग्रीन वॉल' परियोजना शुरू हुई।
  • UNCCD COP14 (2019) में 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षरित भूमि बहाली का संकल्प लिया गया।
  • नहरी क्षेत्रों में जलभराव और खारेपन की समस्या को 'सेम' कहा जाता है।
Advertisement

RAS Prelims MCQ

  1. इसरो Atlas 2021 के अनुसार राजस्थान की कितनी भूमि मरुस्थलीकरण व क्षरण से प्रभावित है?
    A) लगभग 29.7%
    B) लगभग 44.8%
    C) लगभग 62%
    D) लगभग 71.5%
    उत्तर: C) लगभग 62%
    कारण: एटलस 2021 के अनुसार राज्य की 21.23 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 62%) भूमि क्षरण प्रभावित है; 29.7% पूरे भारत का आंकड़ा है।
  2. राजस्थान में भूमि क्षरण का सबसे प्रमुख कारक कौन-सा है?
    A) सेम समस्या
    B) वायु अपरदन (Wind Erosion)
    C) खनन कार्य
    D) वन कटाव
    उत्तर: B) वायु अपरदन (Wind Erosion)
    कारण: इसरो एटलस के अनुसार राजस्थान में वायु अपरदन क्षरण की प्रमुख कारण है।
  3. राजस्थान की लोक परंपरा में 'त्रिकाल' का क्या अर्थ है?
    A) तीन वर्षों का सूखा
    B) अन्न, जल और पशु चारे तीनों का एक साथ संकट
    C) तीन ऋतुओं की गर्मी
    D) तीन जिलों में अकाल
    उत्तर: B) अन्न, जल और पशु चारे तीनों का एक साथ संकट
    कारण: त्रिकाल में खाद्यान्न, पेयजल और पशु चारा तीनों समाप्त हो जाते हैं।
  4. राजस्थान का प्रसिद्ध 'छप्पनिया अकाल' किस वर्ष पड़ा था?
    A) विक्रम संवत 1956 (1899-1900 ई.)
    B) विक्रम संवत 1856 (1799-1800 ई.)
    C) विक्रम संवत 1906 (1849-1850 ई.)
    D) विक्रम संवत 2056 (1999-2000 ई.)
    उत्तर: A) विक्रम संवत 1956 (1899-1900 ई.)
    कारण: यह महा-अकाल विक्रम संवत 1956 में घटित हुआ था।
  5. जोधपुर में स्थित 'काजरी' (CAZRI) की पूर्ण संस्थान के रूप में स्थापना कब हुई?
    A) 1952
    B) 1957
    C) 1959
    D) 1988
    उत्तर: C) 1959
    कारण: यूनेस्को सहयोग से 1959 में काजरी बना (1966 में ICAR के अधीन आया)।
  6. शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI - आफरी) कहाँ स्थित है?
    A) बीकानेर
    B) जोधपुर
    C) जैसलमेर
    D) जयपुर
    उत्तर: B) जोधपुर
    कारण: आफरी 1988 से जोधपुर में ICFRE के अधीन है।
  7. मरु विकास कार्यक्रम (DDP) किस वर्ष शुरू किया गया था?
    A) 1974-75
    B) 1977-78
    C) 1985-86
    D) 1991-92
    उत्तर: B) 1977-78
    कारण: राष्ट्रीय कृषि आयोग की सिफारिश पर DDP 1977-78 में शुरू हुआ।
  8. DPAP और DDP को 2009-10 में किस कार्यक्रम में मिला दिया गया?
    A) मनरेगा (MGNREGA)
    B) एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP)
    C) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना
    D) अरावली ग्रीन वॉल
    उत्तर: B) एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP)
    कारण: DPAP, DDP और IWDP को मिलाकर IWMP बना, जो अब PMKSY का वाटरशेड घटक है।
  9. मार्च 2023 में शुरू अरावली ग्रीन वॉल की चौड़ाई कितनी है?
    A) 2 किमी
    B) 5 किमी
    C) 10 किमी
    D) 12 किमी
    उत्तर: B) 5 किमी
    कारण: अरावली के चारों ओर 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी बनाई जा रही है।
  10. नहरी क्षेत्रों में अत्यधिक सिंचाई से उत्पन्न जलभराव को क्या कहते हैं?
    A) डांग
    B) बीहड़
    C) सेम
    D) कूरियो
    उत्तर: C) सेम
    कारण: नहरी रिसाव और जलजमाव से भूमि दलदली होना सेम कहलाता है।

RAS Mains Questions

Exam के लिए Important Questions नीचे दिए गए हैं:

Short Questions (2–3 marks)

  1. राजस्थान में 'तीजो कूरियो, आठवो काल' कहावत का भावार्थ लिखिए।
    उत्तर रूपरेखा: यह मारवाड़ की लोक उक्ति है जो वर्षा की अनिश्चितता दर्शाती है। इसका अर्थ है कि मरु क्षेत्र में हर तीन साल में आंशिक सूखा (कूरियो) और हर आठ साल में पूर्ण अकाल पड़ता है।
  2. पारंपरिक अकाल वर्गीकरण में 'तृणकाल' और 'जलकाल' में भेद बताइए।
    उत्तर रूपरेखा: 'तृणकाल' में कम वर्षा से पशुओं के लिए घास-चारे का अभाव होता है, जिससे मवेशियों का पलायन होता है। जबकि 'जलकाल' में जलाशय सूखने से इंसानों और पशुओं के समक्ष पेयजल संकट बनता है।
  3. काजरी (CAZRI) के रेत के टीलों के स्थिरीकरण से जुड़े दो प्रमुख कार्य बताइए।
    उत्तर रूपरेखा: 1. पवन दिशा के लंबवत कंटीली झाड़ियों की वायु अवरोधक पट्टियां लगाना। 2. सेवण और धामण घासों से रेत के खिसकने पर रोक लगाना।
  4. 'अरावली ग्रीन वॉल' का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    उत्तर रूपरेखा: मार्च 2023 में शुरू इस योजना का लक्ष्य गुजरात से दिल्ली तक 1,400 किमी लंबी व 5 किमी चौड़ी हरित पट्टी बनाकर थार मरुस्थल के पूर्व की ओर विस्तार को रोकना है।

Long Questions (5–10 marks)

  1. राजस्थान में मरुस्थलीकरण के प्रमुख कारणों और आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - पृष्ठभूमि: राज्य का 61.11% भूभाग मरुस्थल में और इसरो एटलस 2021 के अनुसार लगभग 62% भूमि क्षरण प्रभावित।
    - प्रमुख कारण: वायु अपरदन (सबसे बड़ा कारण), अत्यधिक पशुचारण, वनों का कटाव, सेम समस्या और भूजल दोहन।
    - आर्थिक प्रभाव: फसलों का नुकसान, पशुधन का पलायन, कृषकों की ऋणग्रस्तता और बजट पर राहत व्यय का भारी दबाव।
    - समाधान: काजरी-आफरी तकनीकों का उपयोग, वाटरशेड विकास, सौर कृषि और अरावली हरित दीवार।
  2. राजस्थान में सूखे और अकाल की बारंबारता के भौगोलिक कारणों की समीक्षा कीजिए और स्थाई उपाय सुझाइए। (10 marks)
    उत्तर रूपरेखा:
    - भौगोलिक कारण: अरावली की मानसूनी पवनों के समानांतर स्थिति, बंगाल की खाड़ी के मानसून से दूरी, उच्च तापमान और तेज वाष्पीकरण, सतही जल का अभाव (देश का 1.16%)।
    - ऐतिहासिक संदर्भ: लोक उक्ति (तीजो कूरियो, आठवो काल), छप्पनिया अकाल (वि.सं. 1956) की विभीषिका।
    - स्थाई उपाय: पारंपरिक जल संचयन (टांका, बावड़ी, जोहड़) का पुनरुद्धार, ड्रिप व फव्वारा सिंचाई, शुष्क फसलों (बाजरा, मोठ) का प्रसार और चारा बैंक।

FAQs

इसरो के अनुसार राजस्थान की कितनी भूमि मरुस्थलीकरण से प्रभावित है?

SAC-ISRO के Desertification Atlas 2021 (आंकड़े 2018-19) के अनुसार राज्य की लगभग 21.23 मिलियन हेक्टेयर (लगभग 62%) भूमि मरुस्थलीकरण और क्षरण की चपेट में है, जिसमें वायु अपरदन सबसे बड़ा कारण है।

'छप्पनिया अकाल' किस वर्ष पड़ा था और इसे यह नाम क्यों मिला?

यह महा-अकाल विक्रम संवत 1956 (ईस्वी सन् 1899-1900) में पड़ा था। संवत के 'छप्पन' अंक के आधार पर लोक जीवन में इसे छप्पनिया अकाल कहा गया।

काजरी (CAZRI) और आफरी (AFRI) में क्या अंतर है?

काजरी (1959; 1966 से ICAR) शुष्क कृषि, चारागाह विकास और रेत के टीलों के स्थिरीकरण पर शोध करता है, जबकि आफरी (1988, ICFRE) शुष्क वानिकी और वन संवर्धन पर कार्य करता है। दोनों जोधपुर में स्थित हैं।

नहरी क्षेत्रों में 'सेम' क्या है?

इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र में अत्यधिक पानी और जल निकासी के अभाव में भूजल स्तर ऊपर आने से भूमि दलदली व खारी हो जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में सेम कहते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Quick Answer: राजस्थान का 61.11% भूभाग थार मरुस्थल में आता है, जहाँ लगभग 40% आबादी रहती है।
राजस्थान का भूगोल के पाठ्यक्रम में राजस्थान में सूखा और अकाल: मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मुख्य सिद्धांतों, परीक्षा प्रश्नों और सूत्रों को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
हाँ, NotesMedia पर आपको राजस्थान में सूखा और अकाल: मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर, हल किए गए उदाहरण और नोट्स बिल्कुल मुफ्त मिलेंगे। अधिक अभ्यास के लिए आप हमारा ऐप भी डाउनलोड कर सकते हैं।
Advertisement

In this Chapter

राजस्थान में सूखा और अकाल: मरुस्थलीकरण और पर्यावरणीय चुनौतियाँ
No other notes in this chapter.