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Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला शैलियां, मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती स्कूल

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लेखक Ratan Kumawat · संस्थापक, NotesMedia

प्रकाशित:

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: राजस्थान का इतिहास और संस्कृति (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला शैलियां, मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती स्कूल - वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला शैलियाँ
  • • अवलोकन: Quick Answer: Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला (rajasthan ki chitrakala): 1916 में आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक 'Rajput Painting' में इस...
Quick Answer: Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला (rajasthan ki chitrakala): 1916 में आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक 'Rajput Painting' में इस कला को पहली बार अलग पहचान दी और इसे राजस्थानी व पहाड़ी, दो धाराओं में देखा। भौगोलिक आधार पर राजस्थानी चित्रकला को चार प्रमुख स्कूलों में बांटा जाता है: 1. मेवाड़ स्कूल (उदयपुर, चावंड, Nathdwara व देवगढ़), 2. मारवाड़ स्कूल (जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़ व जैसलमेर), 3. ढूंढाड़ स्कूल (जयपुर, अलवर, उनियारा व शेखावाटी) और 4. हाड़ौती स्कूल (बूंदी व कोटा)। राजस्थान की मूल चित्रकला शैली मेवाड़ है, जहां 1260 में तेजसिंह के समय मेवाड़ शैली का पहला दिनांकित चित्रित ग्रंथ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' (कमलचंद्र) बना। किशनगढ़ की 'बणी-ठणी' को भारत की मोनालिसा कहा जाता है, बूंदी शैली पशु-पक्षियों, बादलों और वर्षा के चित्रण के लिए और कोटा शैली शिकार के दृश्यों के लिए जानी जाती है।
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1. राजस्थान की चित्रकला (Rajasthan ki Chitrakala): उद्भव, विकास और वैज्ञानिक वर्गीकरण

राजस्थान की चित्रकला जैन पोथी चित्रों की अपभ्रंश परंपरा से निकली और 16वीं-17वीं सदी में राजदरबारों में इसकी अलग पहचान बनी। (राजस्थान का सबसे पुराना दिनांकित चित्रित ग्रंथ जैसलमेर जैन भंडार का 'ओघनिर्युक्ति' माना जाता है।) कला संस्कृति के विस्तृत अध्ययन के लिए पढ़ें वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला शैलियाँ और महलों की विरासत के लिए देखें दुर्ग, मंदिर और मेले-त्योहार।

  • पहली पहचान: आनंद कुमारस्वामी ने 1916 में 'Rajput Painting' (दो खंड) लिखी। यह इस विषय की पहली बड़ी किताब थी; इसमें राजस्थान और पंजाब हिमालय (पहाड़ी) की चित्रकला को साथ रखा गया।
  • चार स्कूल: मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती वाला चार स्कूल का बंटवारा बाद के विद्वानों और पाठ्यपुस्तकों का भौगोलिक वर्गीकरण है।
  • रंग: स्वर्ण, रजत, हिंगलू, हरताल, लाजवर्द, नील और गेरू जैसे प्राकृतिक रंगों का प्रयोग हुआ।
  • विस्तार: राज्य के 41 जिलों और 7 संभागों में फैली यह कला चार मुख्य स्कूलों में विभाजित है।

नीचे दी गई table में चारों स्कूलों का संक्षिप्त विवरण है:

स्कूल प्रमुख शैलियां स्वर्णकाल मुख्य पहचान
मेवाड़ स्कूल उदयपुर, चावंड, Nathdwara, देवगढ़ जगतसिंह प्रथम मूल शैली, लाल-पीले रंग, पिछवाई कला
मारवाड़ स्कूल जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर मानसिंह, अनूपसिंह, सावंत सिंह रेतीले टीले, बादामी आंखें, उस्ता कला, बणी-ठणी
ढूंढाड़ स्कूल जयपुर, अलवर, उनियारा, शेखावाटी सवाई प्रताप सिंह, विनय सिंह आदमकद पोर्ट्रेट, सूरतखाना, भित्ति चित्र
हाड़ौती स्कूल बूंदी, कोटा, झालावाड़ उम्मेद सिंह, रामसिंह पशु-पक्षी, प्रकृति, वर्षा में नाचता मोर, शिकार दृश्य

2. मेवाड़ स्कूल (Mewar School of Painting): शैलियां और चित्रकार

मेवाड़ स्कूल राजस्थान की चित्रकला की मूल शैली है। इसके प्रमुख केंद्र नीचे दिए गए हैं:

उदयपुर शैली (Udaipur Style)

  • श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260): रावल तेजसिंह के समय आहड़ में ताड़पत्र पर कमलचंद्र ने चित्रित किया। यह मेवाड़ शैली का पहला दिनांकित चित्रित ग्रंथ माना जाता है।
  • सुपासनाह चरियम (1423): महाराणा मोकल के समय देलवाड़ा में हीरानंद ने चित्रित किया।
  • स्वर्णकाल (जगतसिंह प्रथम 1628-1652): इनके समय राजमहल में 'चितेरों की ओवरी' ('तस्वीरां रो कारखानों') खुला। चित्रकार साहिबदीन ने 1628 में रागमाला बनाई; बाद में रसिकप्रिया, भागवत पुराण और रामायण (युद्धकांड) के चित्र भी बनाए। मनोहर ने रामायण (बालकांड) चित्रित की।
  • पहचान: लाल व पीला रंग, मछली जैसी आंखें, गठीला शरीर और कदंब वृक्ष।

चावंड और Nathdwara शैली (Chavand and Nathdwara Style)

  • चावंड शैली: महाराणा प्रताप के समय शुरू हुई। 1605 में अमरसिंह प्रथम के समय निसारदीन (नासिरुद्दीन) ने 'रागमाला' चित्रित की। म्यूजियम इसे सबसे पुरानी दिनांकित राजस्थानी रागमाला मानते हैं।
  • Nathdwara शैली: 1672 में श्रीनाथजी मंदिर स्थापना से विकसित हुई। यह वल्लभ संप्रदाय पर आधारित है। मूर्ति के पीछे कपड़े पर कृष्ण लीलाओं के चित्रों को 'पिछवाई' कहते हैं। कमला और इलायची प्रसिद्ध महिला चित्रकार थीं।
  • देवगढ़ शैली: मेवाड़ के देवगढ़ ठिकाने (चूंडावत रावत) में विकसित हुई। डॉ. श्रीधर अंधारे ने 1967 के अपने शोध लेख से इसे सामने लाया। चित्रकार: बगता (1769 में उदयपुर से देवगढ़ आए), उनके बेटे चोखा और पोते बैजनाथ।

3. मारवाड़ स्कूल (Marwar School of Painting): शैलियां और मुख्य पहचान

मारवाड़ स्कूल मरुस्थलीय जीवन, शौर्य और प्रेम आख्यानों से जुड़ा है:

जोधपुर और बीकानेर शैली (Jodhpur and Bikaner Style)

  • जोधपुर शैली: राव मालदेव के समय चौखेलाव महल में भित्ति चित्र बने। मानसिंह का काल स्वर्णकाल था, जिसमें 'नाथ चरित्र' और 'शिव पुराण' चित्रित हुए। चित्रकार: शिवदास भाटी, अमरदास, छज्जू भाटी और दाना भाटी। बादामी आंखें और ऊंची पगड़ी इसकी पहचान है।
  • बीकानेर शैली: अनूपसिंह का काल स्वर्णकाल था। दो कलाएं प्रसिद्ध हैं—उस्ता कला (ऊंट की खाल पर सुनहरी मुनव्वती नक्काशी) और मथेरण कला (जैन कलाकारों के चूने पर भित्ति चित्र)। चित्रकार उस्ताद अली रज़ा और रुकनुद्दीन थे। ये चित्रों पर नाम व संवत लिखते थे।

किशनगढ़ और जैसलमेर शैली (Kishangarh and Jaisalmer Style)

  • किशनगढ़ शैली: सावंत सिंह (नागरीदास) का काल स्वर्णकाल था। चित्रकार मोरध्वज निहालचंद ने 'बणी-ठणी' बनाई। कला मर्मज्ञ एरिक डिकिंसन ने इसे 'भारत की मोनालिसा' कहा। 5 मई 1973 को इस चित्र (Radha, Kishangarh) पर 20 पैसे का डाक टिकट जारी हुआ। अमरचंद ने 'चांदनी रात की संगोष्ठी' बनाई। पहचान: खंजन जैसी आंखें, नुकीली नाक, पारदर्शी चुनरी और कमल सरोवर।
  • जैसलमेर शैली: बाहरी प्रभाव से मुक्त विशुद्ध राजस्थानी शैली है, जिसमें 'मूमल' का चित्र प्रधान है।

4. ढूंढाड़ स्कूल (Dhundhad School of Painting): हवेलियां और भित्ति चित्र

ढूंढाड़ स्कूल पर मुगल प्रभाव दिखाई देता है:

जयपुर और अलवर शैली (Jaipur and Alwar Style)

  • जयपुर शैली: सवाई जयसिंह ने 'सूरतखाना' बनाया। सवाई ईश्वरी सिंह के समय चित्रकार साहिबराम ने आदमकद व्यक्ति चित्र बनाए। सवाई प्रताप सिंह का काल स्वर्णकाल था। लालचंद पशुओं की लड़ाई के चित्र बनाने में माहिर था।
  • अलवर शैली: विनय सिंह का काल स्वर्णकाल था। इसमें बसलोई (Border) चित्रण, गणिकाओं के चित्र और योग मुद्राओं के चित्र बने। मूलचंद ने हाथी दांत पर चित्रकारी की। चित्रकार जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम और नंदलाल थे (RAS Pre 2013)।

शेखावाटी और उनियारा शैली (Shekhawati and Uniara Style)

  • शेखावाटी शैली: हवेलियों के भित्ति चित्रों के कारण 'ओपन आर्ट गैलरी' कहलाती है। नवलगढ़ और मंडावा मुख्य केंद्र हैं। इसमें गीले प्लास्टर पर पक्के रंगों से 'आला-गीला' (अरायश) तकनीक अपनाई गई। दीवारों पर रेलगाड़ी, मोटर कार और ग्रामोफोन के चित्र बने।
  • उनियारा शैली: टोंक के उनियारा में जयपुर और बूंदी शैली का मेल हुआ। चित्रकार धीमा और मीर बख्श थे।

5. हाड़ौती स्कूल (Hadoti School of Painting): बूंदी और कोटा शैली

हाड़ौती स्कूल प्रकृति और वन्यजीवों के सजीव अंकन के लिए विख्यात है:

बूंदी और कोटा शैली (Bundi and Kota Style)

  • बूंदी शैली (पशु-पक्षी और प्रकृति): पशु-पक्षियों, सघन वन, बादलों में बिजली और वर्षा में नाचते मोर का चित्रण इसकी पहचान है। राव उम्मेद सिंह के समय तारागढ़ के महल में 'चित्रशाला' बनी, जो भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध है।
  • कोटा शैली (शिकार दृश्य): रामसिंह और उम्मेद सिंह प्रथम का काल स्वर्णकाल था। मुख्य पहचान 'शिकार के दृश्य' हैं, जिसमें रानियों को भी बंदूकों से शेरों का शिकार करते दिखाया गया। 1768 में डालू ने रागमाला सेट बनाया। अन्य चित्रकार लच्छीराम और गोविंद थे।

नीचे दी गई table में प्रमुख शैलियों, चित्रकारों और पहचान का संक्षिप्त विवरण है:

शैली स्वर्णकाल चित्रकार प्रसिद्ध चित्र पहचान व रंग
उदयपुर जगतसिंह प्रथम साहिबदीन, कमलचंद्र श्रावक प्रतिक्रमण, रागमाला लाल-पीला रंग, चितेरों की ओवरी
चावंड अमरसिंह प्रथम निसारदीन रागमाला (1605) विशुद्ध स्थानीय राजस्थानी कला
Nathdwara राजसिंह (1672 से) कमला, इलायची पिछवाई कला, कृष्ण बाल लीला पीला-हरा रंग, केले के पेड़ व गायें
जोधपुर मानसिंह शिवदास, अमरदास, छज्जू भाटी चौखेलाव महल चित्र, नाथ चरित्र पीला रंग, बादामी आंखें, खिड़कीदार पाग
बीकानेर अनूपसिंह उस्ताद अली रज़ा, रुकनुद्दीन उस्ता कला, मथेरण कला चित्रों पर नाम व संवत लिखना
किशनगढ़ सावंत सिंह निहालचंद, अमरचंद बणी-ठणी, चांदनी रात की संगोष्ठी खंजन जैसी आंखें, गुलाबी रंग, कमल झील
जयपुर सवाई प्रताप सिंह साहिबराम, लालचंद आदमकद पोर्ट्रेट, पशुओं की लड़ाई केसरिया व हरा रंग, सूरतखाना
अलवर विनय सिंह जमनादास, मूलचंद हाथी दांत पर चित्र, बसलोई बसलोई बॉर्डर, गणिकाओं के चित्र
शेखावाटी 19वीं सदी स्थानीय चितेरे हवेलियों पर भित्ति चित्र ओपन आर्ट गैलरी, आला-गीला अरायश
बूंदी उम्मेद सिंह चित्रशाला के चितेरे चित्रशाला भित्ति चित्र, नाचता मोर पशु-पक्षी, सघन वन, वर्षा व बादल
कोटा उम्मेद सिंह प्रथम डालू, लच्छीराम घने वनों में शिकार, रानियों का शिकार शिकार दृश्य, नारी वीरता, हरा रंग

महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision)

  • आनंद कुमारस्वामी: 1916 में 'Rajput Painting' लिखकर इस कला को पहली बार अलग पहचान दी।
  • श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260): तेजसिंह के समय कमलचंद्र ने आहड़ में बनाया, मेवाड़ शैली का पहला दिनांकित चित्रित ग्रंथ।
  • चितेरों की ओवरी: जगतसिंह प्रथम ने उदयपुर महल में कला विभाग स्थापित किया ('तस्वीरां रो कारखानों')।
  • चावंड रागमाला (1605): अमरसिंह प्रथम के समय निसारदीन ने तैयार की।
  • पिछवाई चित्रकला: Nathdwara में श्रीनाथजी के पीछे कपड़े पर कृष्ण लीला अंकन; महिला चित्रकार कमला व इलायची।
  • देवगढ़ शैली: चूंडावत ठिकाने की शैली; बगता और चोखा मुख्य चित्रकार, डॉ. श्रीधर अंधारे ने इसे उजागर किया।
  • जोधपुर शैली: मानसिंह का काल स्वर्णकाल; नाथ संप्रदाय से जुड़े चित्र बने; चित्रकार शिवदास भाटी (RAS Pre 2024)।
  • RAS Pre 2024 मिलान: किशनगढ़-निहालचंद, बीकानेर-अली रज़ा, मेवाड़-साहिबदीन, मारवाड़-शिवदास।
  • उस्ता व मथेरण कला: बीकानेर शैली; कलाकार नाम व संवत लिखते थे।
  • बणी-ठणी: सावंत सिंह के समय निहालचंद की कृति; एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा।
  • साहिबराम: ईश्वरी सिंह के समय आदमकद व्यक्ति चित्र बनाने वाला चित्रकार।
  • अलवर शैली के चित्रकार: जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम और नंदलाल (RAS Pre 2013)।
  • हाथी दांत पर चित्र: अलवर शैली के कलाकार मूलचंद ने हाथी दांत पर चित्र बनाए।
  • शेखावाटी हवेलियां: भित्ति चित्रों के लिए 'ओपन आर्ट गैलरी'; आला-गीला तकनीक।
  • बूंदी शैली: पशु-पक्षियों व नाचते मोर का चित्रण; उम्मेद सिंह के समय तारागढ़ में 'चित्रशाला' बनी।
  • कोटा शैली: शिकार के रोमांचक दृश्यों और रानियों के शेरों के शिकार के लिए विख्यात।
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RAS Prelims MCQ

  1. 1916 में 'Rajput Painting' पुस्तक लिखकर राजस्थानी (राजपूत) चित्रकला को पहली बार अलग पहचान किसने दी?
    A) राय कृष्णदास
    B) आनंद कुमारस्वामी
    C) एरिक डिकिंसन
    D) कर्नल जेम्स टॉड
    उत्तर: B) आनंद कुमारस्वामी
    कारण: आनंद कुमारस्वामी की 1916 की 'Rajput Painting' इस विषय की पहली बड़ी किताब थी।
  2. मेवाड़ शैली का पहला दिनांकित चित्रित ग्रंथ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' (1260 ईस्वी) किस शासक के काल में बना?
    A) महाराणा कुंभा
    B) रावल तेजसिंह
    C) महाराणा मोकल
    D) महाराणा जगतसिंह प्रथम
    उत्तर: B) रावल तेजसिंह
    कारण: 1260 ई. में तेजसिंह के समय कमलचंद्र ने आहड़ में यह ग्रंथ तैयार किया।
  3. मेवाड़ के किस शासक ने राजमहल में 'चितेरों की ओवरी' (तस्वीरां रो कारखानों) नामक कला विभाग स्थापित किया?
    A) महाराणा प्रताप
    B) महाराणा अमरसिंह प्रथम
    C) महाराणा जगतसिंह प्रथम
    D) महाराणा जयसिंह
    उत्तर: C) महाराणा जगतसिंह प्रथम
    कारण: जगतसिंह प्रथम ने महल में कला विभाग 'चितेरों की ओवरी' स्थापित किया।
  4. चावंड शैली में 1605 ईस्वी का प्रसिद्ध 'रागमाला' ग्रंथ किस चित्रकार ने चित्रित किया?
    A) साहिबदीन
    B) निसारदीन (नासिरुद्दीन)
    C) मनोहर
    D) हीरानंद
    उत्तर: B) निसारदीन (नासिरुद्दीन)
    कारण: 1605 में अमरसिंह प्रथम के समय निसारदीन ने चावंड रागमाला बनाई।
  5. कमला और इलायची नामक महिला चित्रकारों का संबंध राजस्थान की किस चित्रकला शैली से है?
    A) किशनगढ़ शैली
    B) अलवर शैली
    C) Nathdwara शैली (Nathdwara)
    D) कोटा शैली
    उत्तर: C) Nathdwara शैली (Nathdwara)
    कारण: कमला व इलायची Nathdwara शैली (पिछवाई कला) की महिला चित्रकार थीं।
  6. राजस्थान की किस चित्रकला शैली में चित्रकार अपने चित्रों पर अपना नाम, पिता का नाम और संवत लिखते थे?
    A) बीकानेर शैली
    B) बूंदी शैली
    C) जयपुर शैली
    D) उदयपुर शैली
    उत्तर: A) बीकानेर शैली
    कारण: बीकानेर शैली के कलाकार चित्रों पर नाम, पिता का नाम और संवत लिखते थे।
  7. किशनगढ़ की विश्वविख्यात कृति 'बणी-ठणी' को 'भारत की मोनालिसा' की संज्ञा किसने दी थी?
    A) आनंद कुमारस्वामी
    B) एरिक डिकिंसन
    C) फर्ग्यूसन
    D) कर्नल टॉड
    उत्तर: B) एरिक डिकिंसन
    कारण: एरिक डिकिंसन ने निहालचंद के बनाए बणी-ठणी चित्र को भारत की मोनालिसा कहा।
  8. जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम और नंदलाल राजस्थान की किस चित्रकला शैली के प्रमुख चित्रकार थे?
    A) बीकानेर शैली
    B) मारवाड़ शैली
    C) अलवर शैली
    D) झालावाड़ शैली
    उत्तर: C) अलवर शैली
    कारण: ये सभी चित्रकार अलवर शैली से जुड़े थे (RPSC Pre 2013)।
  9. पशु-पक्षियों, वर्षा में नाचते मोर और तारागढ़ की 'चित्रशाला' के लिए राजस्थान की कौन सी शैली प्रसिद्ध है?
    A) कोटा शैली
    B) बूंदी शैली
    C) आमेर शैली
    D) देवगढ़ शैली
    उत्तर: B) बूंदी शैली
    कारण: बूंदी शैली पशु-पक्षी और प्रकृति के चित्रण के लिए जानी जाती है; चित्रशाला बूंदी के तारागढ़ महल में है।
  10. किस चित्रकला शैली में रानियों और महिलाओं को भी पुरुषों के साथ घने जंगलों में शिकार करते हुए चित्रित किया गया है?
    A) कोटा शैली
    B) जोधपुर शैली
    C) बीकानेर शैली
    D) उनियारा शैली
    उत्तर: A) कोटा शैली
    कारण: कोटा शैली की मुख्य पहचान शिकार के दृश्य हैं, जिनमें रानियां भी शिकार करती दिखाई गईं।

RAS Mains Questions

Exam के लिए Important Questions नीचे दिए गए हैं:

Short Questions (2–3 marks)

  1. राजस्थान की चित्रकला में 'चितेरों की ओवरी' क्या थी? (20 शब्द)
    उत्तर: मेवाड़ महाराणा जगतसिंह प्रथम ने महल में कला विभाग खोला, जिसे चितेरों की ओवरी या 'तस्वीरां रो कारखानों' कहते हैं।
  2. पिछवाई चित्रकला (Pichhwai Painting) से क्या तात्पर्य है? (20 शब्द)
    उत्तर: Nathdwara में श्रीनाथजी के विग्रह के पीछे कपड़े पर कृष्ण बाल-लीलाओं के बने चित्रों को पिछवाई कहते हैं।
  3. किशनगढ़ शैली की 'बणी-ठणी' की दो मुख्य शारीरिक पहचान बताइए। (20 शब्द)
    उत्तर: खंजन पक्षी जैसी नुकीली आंखें, धनुषाकार भौंहें, सुराहीदार गर्दन और सिर पर पारदर्शी ओढ़नी।
  4. शेखावाटी क्षेत्र को 'ओपन आर्ट गैलरी' क्यों कहा जाता है? (20 शब्द)
    उत्तर: विशाल हवेलियों की दीवारों पर अरायश पद्धति से बने भव्य भित्ति चित्रों के कारण इसे ओपन आर्ट गैलरी कहते हैं।
  5. कोटा चित्रकला शैली की सबसे अनोखी पहचान क्या है? (20 शब्द)
    उत्तर: सघन वनों में हिंसक वन्यजीवों के शिकार दृश्य और रानियों के बंदूकों से शेरों का शिकार करना।

Long Questions (5–10 marks)

  1. राजस्थानी चित्रकला के प्रमुख स्कूलों का वर्गीकरण करते हुए मेवाड़ और हाड़ौती स्कूल की तुलना कीजिए। (100 शब्द)
    उत्तर रूपरेखा:
    1. वर्गीकरण: आनंद कुमारस्वामी (1916) ने इसे पहली पहचान दी; भौगोलिक आधार पर चार मुख्य स्कूल माने जाते हैं: मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती।
    2. मेवाड़ स्कूल: राजस्थान की मूल शैली है। धार्मिक विषय (भागवत, रामायण, पिछवाई) प्रधान हैं। लाल-पीले रंगों, कदंब वृक्षों और मीनाकृत आंखों का प्रयोग मिलता है। प्रमुख केंद्र उदयपुर, चावंड और Nathdwara हैं।
    3. हाड़ौती स्कूल: प्रकृति और वीरता पर केंद्रित है। बूंदी शैली पशु-पक्षियों के चित्रण (वर्षा में नाचता मोर) और चित्रशाला के लिए जानी जाती है। कोटा शैली में रानियों के शिकार के साहसिक दृश्य मिलते हैं।
    4. तुलना: मेवाड़ भक्ति और लोक-परंपरा की धारा है, जबकि हाड़ौती प्रकृति और राजसी शिकार का सजीव अंकन है।
  2. किशनगढ़ चित्रकला शैली और बीकानेर शैली की कलागत पहचान और मुख्य योगदान का परीक्षण कीजिए। (100 शब्द)
    उत्तर रूपरेखा:
    1. किशनगढ़ शैली: सावंत सिंह (नागरीदास) के समय उत्कर्ष पर पहुंची। निहालचंद के चित्र 'बणी-ठणी' को एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा (1973 में डाक टिकट)। इसमें खंजन आंखें और पारदर्शी वस्त्र मुख्य हैं।
    2. बीकानेर शैली: अनूपसिंह का काल स्वर्णकाल था। उस्ता कला (ऊंट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी) और मथेरण कला (जैन भित्ति चित्र) विकसित हुई। कलाकार चित्रों पर अपना नाम, पिता का नाम और संवत अंकित करते थे।
    3. महत्व: किशनगढ़ ने नारी सौंदर्य और भक्ति रस को ऊंचाई दी, जबकि बीकानेर ने बारीक रेखांकन की मिसाल कायम की।

FAQs

प्रश्न 1: राजस्थान की सबसे पुरानी (मूल) चित्र शैली कौन सी मानी जाती है?
उत्तर: मेवाड़ शैली। इसका पहला दिनांकित चित्रित ग्रंथ 1260 में तेजसिंह के समय बना 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' है।

प्रश्न 2: भारत की मोनालिसा किसे कहा जाता है?
उत्तर: किशनगढ़ शैली के विश्वविख्यात चित्र 'बणी-ठणी' (चित्रकार मोरध्वज निहालचंद) को एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा था।

प्रश्न 3: बूंदी शैली की मुख्य पहचान क्या है?
उत्तर: पशु-पक्षियों, सघन वनस्पति, बादल-बिजली और वर्षा में नाचते मोर का चित्रण; तारागढ़ महल की चित्रशाला इसके भित्ति चित्रों का खजाना है।

प्रश्न 4: आला-गीला या अरायश पद्धति क्या है?
उत्तर: चूने के गीले प्लास्टर पर पक्के रंगों से भित्ति चित्र बनाने की पारंपरिक राजस्थानी कला को आला-गीला या अरायश कहा जाता है। यह शेखावाटी में प्रसिद्ध है।

प्रश्न 5: साहिबदीन और साहिबराम में क्या अंतर है?
उत्तर: साहिबदीन मेवाड़ शैली के चित्रकार थे जिन्होंने रागमाला बनाई, जबकि साहिबराम जयपुर शैली के चित्रकार थे जिन्होंने ईश्वरी सिंह का आदमकद चित्र बनाया था।

परीक्षा के लिए याद रखें

  • मेवाड़ शैली सबसे पुरानी: 1260 का श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (आहड़, कमलचंद्र)।
  • चावंड रागमाला 1605: चित्रकार निसारदीन, अमरसिंह प्रथम का समय।
  • मेवाड़-साहिबदीन, बीकानेर-अली रज़ा, किशनगढ़-निहालचंद, मारवाड़-शिवदास (RAS Pre 2024)।
  • अलवर शैली: जमनादास, छोटेलाल, बक्साराम, नंदलाल (RAS Pre 2013); स्वर्णकाल विनय सिंह।
  • बणी-ठणी (किशनगढ़, सावंत सिंह/नागरीदास के समय): एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा; 1973 में डाक टिकट।
  • Nathdwara: पिछवाई; बूंदी: पशु-पक्षी और चित्रशाला; कोटा: शिकार दृश्य।
  • शेखावाटी: हवेलियों के भित्ति चित्र, 'ओपन आर्ट गैलरी', आला-गीला तकनीक।

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Quick Answer: Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला (rajasthan ki chitrakala): 1916 में आनंद कुमारस्वामी ने अपनी पुस्तक 'Rajput Painting' में इस कला को पहली बार अलग पहचान दी और इसे राजस्थानी व पहाड़ी, दो धाराओं में देखा।
राजस्थान का इतिहास और संस्कृति के पाठ्यक्रम में Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला शैलियां, मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती स्कूल एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मुख्य सिद्धांतों, परीक्षा प्रश्नों और सूत्रों को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
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In this Chapter

Rajasthan ki Chitrakala: राजस्थान की चित्रकला शैलियां, मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़ और हाड़ौती स्कूल
राजस्थान का स्थापत्य, मूर्तिशिल्प एवं चित्रशैलियाँ