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परम्परागत जल प्रबन्धन

त्वरित सारांश और मुख्य बिंदु

  • • विषय फोकस: राजस्थान का भूगोल (RAS (आरपीएससी) Syllabus)
  • • मुख्य विषय: परम्परागत जल प्रबन्धन - पारंपरिक जल प्रबंधन (बावड़ी, खड़ीन, टांका)
  • • अवलोकन: अध्याय सारराजस्थान में भौगोलिक विषमताओं के कारण जल संरक्षण की सुदृढ़ परम्परा रही है। यहाँ वर्षा जल संचयन के लिए नाड़ी, बावड़ी, टांका और खड़ीन जैसी विशिष...

अध्याय सार

राजस्थान में भौगोलिक विषमताओं के कारण जल संरक्षण की सुदृढ़ परम्परा रही है। यहाँ वर्षा जल संचयन के लिए नाड़ी, बावड़ी, टांका और खड़ीन जैसी विशिष्ट प्रणालियाँ विकसित की गईं, जो सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी थीं।

प्रमुख परम्परागत जल स्रोत

  • नाड़ी: वर्षा जल इकट्ठा करने के लिए बनाए गए छोटे तालाब। पश्चिमी राजस्थान में इनका विशेष महत्व है। सर्वप्रथम 1520 ई. में राव जोधा ने नाड़ी का निर्माण करवाया था।
  • बावड़ी: सीढ़ीदार कुएं जो स्थापत्य कला का नमूना होते हैं।
    • चाँद बावड़ी (आभानेरी): प्रसिद्ध उदाहरण है।
    • अपराजितपृच्छा ग्रंथ में बावड़ियों के चार प्रकार बताए गए हैं। मेघदूत में भी इनका उल्लेख है।
  • टांका: रेगिस्तानी क्षेत्रों और किलों में वर्षा जल संग्रह हेतु बनाए गए भूमिगत टैंक।
    • जिस आंगन से पानी बहकर आता है उसे आगोर या पायतन कहते हैं।
    • इसे 'कुंड' भी कहा जाता है।
  • खड़ीन: 15वीं सदी में जैसलमेर के पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित तकनीक। इसमें ढलान वाली भूमि पर पाल बनाकर पानी रोका जाता है, जिससे नमी सुरक्षित रहती है और खेती की जाती है।
  • झालरा: ये आयताकार सीढ़ीदार जलाशय होते हैं जो स्वयं के आगोर से नहीं, बल्कि ऊपर स्थित तालाबों के रिसाव से पानी प्राप्त करते हैं (जैसे: महामंदिर झालरा, जोधपुर, 1660 ई.)।
  • कुई / बेरी: तालाब के पास खुदे हुए 10-12 मीटर गहरे गड्ढे। ये तालाब का पानी सूखने पर भी (जैसे 1987 के सूखे में) रिसाव के जरिए पानी उपलब्ध कराते हैं।
  • टोबा: यह नाड़ी के समान आकृति वाला होता है लेकिन उससे अधिक गहरा होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

अध्याय सारराजस्थान में भौगोलिक विषमताओं के कारण जल संरक्षण की सुदृढ़ परम्परा रही है।
राजस्थान का भूगोल के पाठ्यक्रम में परम्परागत जल प्रबन्धन एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह मुख्य सिद्धांतों, परीक्षा प्रश्नों और सूत्रों को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है।
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