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स्वतंत्रता पूर्व राजस्थान में सामाजिक सुधार

अध्याय सार

19वीं सदी में भारत के पुनर्जागरण का प्रभाव राजस्थान पर भी पड़ा। प्राचीन वर्ण व्यवस्था जो कर्म पर आधारित थी, कालांतर में जातिगत और रूढ़िवादी हो गई। समाज में सती प्रथा, कन्या वध, त्याग प्रथा और डाकन प्रथा जैसी कुरीतियाँ व्याप्त हो गई थीं। ब्रिटिश सरकार और समाज सुधारकों ने इनके निवारण हेतु महत्वपूर्ण प्रयास किए।

प्रमुख सामाजिक कुरीतियाँ एवं सुधार

1. सती प्रथा

  • पृष्ठभूमि: राजा राममोहन राय के प्रयासों से 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा निषेध कानून बनाया।
  • राजस्थान में प्रयास:
    • 1844: जयपुर संरक्षण समिति (Jaipur Guardian Committee) ने सती उन्मूलन हेतु विधेयक पारित किया, जो राजस्थान में प्रथम वैधानिक प्रयास था।
    • रोक लगाने वाली रियासतें: डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ (1846), कोटा व जोधपुर (1848), तथा मेवाड़ (1860)।
    • 1861: ब्रिटिश अधिकारियों ने कठोर नियम लागू किए, जिसमें शासक की तोपों की सलामी घटाना और जागीर जब्त करना शामिल था।

2. कन्या वध

  • कारण: कर्नल टॉड ने इसे दहेज प्रथा और 'त्याग' से जुड़ा माना।
  • सुधार कार्य:
    • सर्वप्रथम मेवाड़ महाराणा ने ब्रिटिश दबाव में कानून बनाकर इसे प्रतिबंधित किया।
    • 1839: जोधपुर महाराजा ने 'कोड ऑफ़ रूल्स' बनाए।
    • 1844: जयपुर ने इसे अनुचित घोषित किया।
    • 1888 के बाद यह कुप्रथा लगभग समाप्त हो गई।

3. विवाह सुधार (त्याग प्रथा, बाल विवाह)

  • त्याग प्रथा (टीका/रीत): विवाह के समय वर-वधू पक्ष द्वारा दिए जाने वाले महंगे उपहारों (टीका/रीत) पर रोक लगाई गई।
  • वाल्टरकृत राजपूत हितकारिणी सभा (1889):
    • ए.जी.जी. (AGG) वाल्टर द्वारा अजमेर में गठित।
    • उद्देश्य: विवाह खर्च सीमित करना, बहुविवाह समाप्त करना।
    • विवाह आयु: लड़के के लिए 18 वर्ष और लड़की के लिए 14 वर्ष तय की गई।
  • देश हितेषिणी सभा (1877): उदयपुर में स्थापित, उद्देश्य विवाह खर्च सीमित करना था।
  • बाल विवाह: 10 दिसंबर 1903 को अलवर रियासत ने बाल विवाह और अनमेल विवाह निषेध कानून बनाया।

4. अन्य कुरीतियाँ

  • डाकन प्रथा: 1853 में मेवाड़ में (कर्नल ईडन के परामर्श पर) इसे गैर-कानूनी घोषित किया गया।
  • दास प्रथा: दासों को गोला, दरोगा या चाकर कहा जाता था। यह वंशानुगत होते थे।

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