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विरासत: दुर्ग, महल, मंदिर और साहित्य

अध्याय सार

राजस्थान की विरासत साहित्य और स्थापत्य कला में अत्यंत समृद्ध है। यहाँ का साहित्य संस्कृत, प्राकृत से लेकर डिंगल और मरू भाषा (मारवाड़ी) तक विकसित हुआ। स्थापत्य में अभेद्य दुर्ग, महामारू शैली के मंदिर और कलात्मक हवेलियाँ प्रमुख हैं। जंतर-मंतर जैसी वेधशालाएँ प्राचीन विज्ञान का प्रमाण हैं।

साहित्य

  • मरू भाषा: इसका उल्लेख 8वीं सदी के ग्रंथ कुवलयमाला (उद्योतन सूरी) में मिलता है।
  • चारण साहित्य: यह वीर रस प्रधान है। प्रमुख रचनाएँ: पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), वंश भास्कर (सूर्यमल मिश्रण), अचलदास खींची री वचनिका
  • जैन साहित्य: वज्रसेन सूरी कृत भरतेश्वर बाहुबली घोर एक प्रमुख ग्रंथ है।

स्थापत्य: दुर्ग (Forts)

शुक्र नीति में 9 प्रकार के दुर्ग बताए गए हैं। कौटिल्य ने 4 श्रेणियाँ बताईं: औदक (जल), पार्वत (पहाड़ी), धन्वन (मरुस्थल), और वन दुर्ग।

दुर्गश्रेणी/तथ्यनिर्माता/शासक
गागरोणऔदक (जल दुर्ग), काली सिंध नदी के तट पर।परमार शासक
चित्तौड़गढ़पार्वत दुर्ग, मेसा पठार पर। विजय स्तम्भ स्थित है।चित्रांगद मोरी
कुम्भलगढ़1458 में निर्मित। शिल्पी: मंडनराणा कुम्भा
जैसलमेर (सोनारगढ़)धन्वन दुर्ग। चूने का प्रयोग नहीं (पत्थर पर पत्थर)।रावल जैसल (1155 ई.)
लोहागढ़ (भरतपुर)मिट्टी का किला। अष्टधातु दरवाजा (दिल्ली से लाया गया)।राजा सूरजमल (1733 ई.)
चूरू का किला1857 में गोला-बारूद खत्म होने पर चांदी के गोले दागे।ठाकुर शिवसिंह
भटनेर (हनुमानगढ़)प्राचीनतम दुर्ग, मूलतः मिट्टी से निर्मित।भाटी शासक

मंदिर और अन्य स्थापत्य

  • मंदिर शैली: 8वीं से 11वीं सदी (गुर्जर-प्रतिहार काल) मंदिर शिल्प का स्वर्ण युग था। इसे महामारू शैली कहा जाता है।
    • उदाहरण: ओसियां, किराडू (सोमेश्वर मंदिर), आभानेरी (हर्षत माता)।
    • तिथि युक्त मंदिर: शीतलेश्वर महादेव (झालावाड़) राजस्थान का पहला तिथि युक्त मंदिर है।
  • हवेलियाँ: जैसलमेर की हवेलियाँ (पटवों की, सालिम सिंह की) पत्थर की जालीदार कटाई के लिए और शेखावाटी की हवेलियाँ भित्ति चित्रों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • जंतर-मंतर (जयपुर): सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित वेधशाला। इसका 'सम्राट यंत्र' सबसे बड़ा है। यह यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर सूची में शामिल है।

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